Best Srimad Bhagavad Gita in hindi in detail – श्रीमदभगवदगीता के 18 अध्याय

सम्पूर्ण भगवद गीता (Bhagavad Gita in hindi) को संस्कृत भाषा में लिखा गया है, जिसे पढ़ पाना सरल नहीं है। इसलिए हमने इसे सबसे सरल भाषा हिंदी में लिखा है जो पढ़ने में आसान है और Bhagavad Gita in hindi के इस आर्टिकल को पढ़ने बाद आपको भगवद गीता समझ में आने लगेगा। हमने इस Bhagavad Gita in Hindi को कम से कम शब्दों में समझाने की कोशिश की है।

Bhagavad Gita के कुल 18 अध्याय है, हमने भी इसे 18 अध्याय में ही है। Bhagavad Gita in Hindi का पहला अध्याय अब शुरू होता है।

Contents

पहला अध्याय (1st Chapter of Bhagavad Gita in Hindi)

Bhagwat Geeta adhyay 1 – भगवद गीता अध्याय 1 | Geeta adhyay 1 in hindi

धतराष्ट बोले – हे संजय ! धर्म भूमि कुरुक्षेत्र में एकत्र युद्ध इच्छा वाले मेरे पुत्रों और पाण्डव पुत्रों ने क्या किया ?

महाराज, उस समय राजकुमार दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना को देखकर गरु द्रोणाचार्य के पास जाकर कहा-हे आचार्य! आपके पास मैं इसलिए आया हूँ कि आप पाण्डवों की व्यूहाकार खड़ी इस विशाल सेना का अवलोकन करें। उस सेना में बड़े वीर अपने धनुष धारण किए तैयार खड़े हैं। इनमें सबसे महान योद्धा भीम, अर्जुन और इनके समान अनेक वीर हैं। हे गुरुदेव! उन सबको देखकर आप इनकी तुलना में हमारे पास जो श्रेष्ठ वीर हैं उनके बारे में मुझे बतायें।

एक तो स्वयं आप और भीष्म पितामह, वीर कर्ण, कृपाचार्य जेसे अनेकों वीर हैं। भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी यह सेना सब प्रकार से अजेय है। अब आप ही ये सब कछ देख सकते हैं। इसलिए निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें।

इस प्रकार द्रोणाचार्य द्वारा कहे हुए वचनों को सुनकर कौरवों में वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने दुर्योधन के हृदय में हर्ष पैदा करते हुए उच्च स्वर से शंख नाद किया। इसके साथ ही अन्य शंख, ढोल, नगाड़े आदि बजने लगे।

उसके पश्चात सफेद घोड़ों से युक्त सजे हुए रथ में बैठकर श्रीकृष्ण जी आए। अर्जुन ने भी अपना अलौकिक देवदत्त शंख बजाया। श्रीकृष्ण ने पंचजन्य नामक शंख, भीमसेन ने पोंड नामक शंख बजाया।

कुन्ती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्त नामक विजयी शंख बजाया। इस तरह से पाण्डव सेना के सारे वीरों ने बारी-बारी से अपने अपने शंख बजाये । इन भयंकर शंख नादों ने आकाश और पृथ्वी को कंपायमान कर दिया जिससे धृतराष्ट्र पुत्रों का हृदय विर्दीण हो गया।

हे राजन्! उसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने खड़े हुए धृतराष्ट्र पुत्रों को देखकर धनुष उठाकर ऋषिकेष श्रीकृष्ण जी से यह कहा-हे अच्युत, मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में इस प्रकार खड़ा कर दो की मैं देख सकूँ की मुझे किस-किस से युद्ध करना है । मैं सबको अच्छी तरह से देखना चाहता हूँ।

संजय बोला-हे महाराज धृतराष्ट्र जी! अर्जुन द्वारा कहे गये शब्दों: को सुनकर श्रीकृष्ण बोले-लो अर्जुन अब तुम अपनी मनोकामना पूरी कर लो, देखो सामने पितामह भीष्म खड़े हैं।

अर्जुन ने युद्ध क्षेत्र के चारों ओर दृष्टि डाली। उसने कौरवों, भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य और उनके पास खड़े दुर्योधन को बड़े ध्यान से देखा, फिर उदास भरे स्वर में बोला

हे माधव! इस युद्ध में खड़े हुए अपने गुरु, भीष्म पितामह एवं भाई बंधुओं को देखकर मेरा शरीर शिथिल होता जा रहा है, गला खुश्क हो रहा है, मेरे हाथों में धनुष को पकड़ने की शक्ति नहीं रही। लक्षणों को भी विपरीत हो देख रहा हूँ। इस युद्ध में अपने ही सगे सम्बन्धियों को मारकर यह राज्य प्राप्त करके क्या करूँगा? मुझसे यह पाप नहीं होगा प्रभु, आप मेरे रथ को वापस ले चलो। इस युद्ध में कोई कल्याण नहीं दिखाई देता है।

तुम क्या कह रहे हो पार्थ, श्रीकृष्ण जी ने आश्चर्य से अर्जुन के उदास मुख की ओर देखा।

प्रभु यह पाप है। अपने ही वंश के लोगों को मारकर राज्य प्राप्त करना पाप है। ऐसा पाप तो कोई पागल ही कर सकता है। प्रभु मेरे रथ को युद्ध क्षेत्र से ले चलो। मैं युद्ध नहीं करना चाहता।

हे महाराज धृतराष्ट्र जी, इतना कहकर अर्जुन धनुष रखकर रथ के पिछले भाग में जा बैठा।

संजय ने धृतराष्ट्र की अंधी आँखों से झाँका और सोचने लगा कि राजा अन्धा होते द्वारा भी अपने वंश के दस महायद्ध का प्रत्यक सुनना चाहते हैं।

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दूसरा अध्याय (2nd Chapter of Bhagavad Gita in Hindi)

Bhagavad Gita chapter 2 – Bhagwat Geeta adhyay 2 | गीता का दूसरा अध्याय

महाराज धतराष्ट्र ने संजय से आगे का हाल बताने के लिए कहा। संजय बोला-चिंतित अर्जुन की आँखों में आँसू देखकर भगवान श्रीकृष्ण बोले-हे अर्जुन ! इस युद्ध स्थल में तुम यह कैसी अज्ञानता भरी बातें कर रहे हो । तुम्हारे जैसे वीर के मुँह से नपुसंकता की बातें करना शोभा नहीं देता। उठो, युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।

हे प्रभु! आप ही बतायें मैं इस युद्ध में गुरु द्रोणाचार्य और भीष्प पितामह पर बाण चला कर उनकी हत्या कैसे कर सकता हूँ? ये दोनों तो मेरे पूज्य हैं। इनके खून से हाथ रंगकर यदि मुझे राज्य प्राप्त हो भी जाए तो मुझे उससे आत्मिक शान्ति नहीं मिलेगी। दूसरे अपने पिता के सगे भाई की सन्तानों को मारकर मुझे क्या मिलेगा? आप मुझे पाप के भागीदार क्यों बनाना चाहते हैं। भगवन् मैं तो अंधेरे में भटक गया हूँ। मेरे मन की शंकाओं को दूर कीजिए।

भगवान् कृष्ण ने हँसते हुए अर्जुन की ओर देखकर कहा-हे अर्जुन! तुम शोक क्यों करते हो? आत्मा तो नित्य है। इसलिए किसी प्रकार की चिंता करना बेकार है। न यह सत्य है कि मैं किसी युग में नहीं था या तुम किसी युग में नहीं थे और न ही यह बात सत्य है कि हम आगे नहीं होंगे। जैसे जीवात्मा इस शरीर में युवा और वृद्धावस्था में होती है वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है। यह बात केवल बुद्धिमान और ज्ञानी पुरुष ही जानते हैं ।

ज्ञानी पुरुष इस मायाजाल से प्रभावित नहीं होते। यह मत भूलो कि आत्मा कभी मरती नहीं है। यह आत्मा अजर अमर है। जिस प्रकार वस्त्रों के फट जाने पर उन्हें बदल लेते हैं उसी प्रकार आत्मा भी शरीर के जर्जर होने पर दूसरा चोला बदल लेती है। यह शरीर ही बदल जाता है । मानव कभी नहीं मरता। शरीर जरूर बदलता है। सब कुछ इन्द्रियों का ही दोष है । किसी धीर पुरुष को ये इन्द्रियाँ व्याकुल नहीं कर सकती। वह मोक्ष के योग्य होता है।

हे पार्थ ! वस्तु का अस्तित्व नहीं और सत का अभाव नहीं है।

इस प्रकार इस दोनों का ही तत्व ज्ञानी पुरुषों द्वारा किया गया है। क्योंकि इस अविनाश का विनाश करनेवाला नहीं है। जिसमें यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है। नित्य स्वरूप जीवात्मा के यह सब शरीर नाशवान कहे गये हैं। इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन तू युद्ध कर।

जो इस आत्मा को मारने वाला नहीं समझता तथा जो इसको मरा मानता है वे दोनों ही नहीं जानते कि यह आत्मा न मरती है और न मारी जाती है, यह अजर अमर है।

हे अर्जुन, जो पुरुष इस आत्मा को नाश रहित नित्य अजन्मा मानता है वह पुरुष कैसे किसको मरवा सकता है और कैसे किसको मार सकता है ? शब्द, स्पर्श, रूप गंध जो इन्द्रियों के विषय हैं, यह. सर्दी, गर्मी, दुख, सुख के देने वाले हैं। जिनको इन्द्रियों के सुख-दुख अपनी निश्चलता से चलायमान न कर सके उन्हीं पुरुषों ने अमृत पान किया है।

हे धनुर्धर ! जिनको इन्द्रियों के विषय नहीं सताते, जो सुख-दुख में समान रहते हैं वह पुरुष ही मोक्ष के अधिकारी होते हैं।

आत्मा महान है, यही गुरु है यही अमर है। तुम भीष्म पितामह की मृत्यु की बात करते हो, वह व्यर्थ है। उनकी आत्मा को तुम नहीं मार सकते, केवल उनका शरीर ही समाप्त होगा आत्मा तो आवागमन है। जैसे प्राणी पुराने वस्त्रों को उतारकर नये वस्त्र धारण कर लेता है वैसे ही आत्मा पुराने शरीर रूपी वस्त्र को उतार कर नए शरीर रूपी वस्त्र धारण कर लेती है।

फिर तुम क्षत्रिय हो। क्या तुम अपने धर्म का पालन नहीं करोगे, क्या तुम नहीं जानते कि जो क्षत्रिय युद्ध के मैदान में मरता है वह सीधा स्वर्ग को जाता है। यदि तुम युद्ध नहीं करोगे तो तुम पाप के भागी बनोगे। ये सारे योद्धा तुम्हें कायर समझेंगे। क्या तुम यह अपमान सह सकोगे ?

हे अर्जुन ! कर्म करना तुम्हारा कर्तव्य है । फल की आशा मत करो। जिसके कर्म अच्छे होते हैं उसे तो अच्छा ही फल मिलता है।

हे पार्थ ! बुद्धि से कर्म नीचा माना गया है । इसलिए बुद्धि का सहारा लेकर कर्म करो । जो पुरुष ज्ञानी होते हैं वे किसी फल की इच्छा नहीं करते । जो फल की इच्छा करते हैं वे नीच मति के जो बुद्धि योग से कर्म करता है, वह इसी संसार में संचित पाप पण को त्याग देता है । जब तुम्हारी बुद्धि इस मोह रूपी सुख-दुख से पार होकर अत्यन्त शुद्ध हो जाएगी, तब तुम विरक्त हो जाओगे । अभी मोह माया के जाल में पड़कर तुम्हारी बुद्धि अस्थिर हो गई है । बदि के स्थिर हो जाने पर तुम्हें सब पता चल जायेगा।

हे माधव ! मुझे यह बताओ जिस पुरुष की बुद्धि स्थिर हो, उसके क्या लक्षण होते हैं ?

हे पार्थ ! जिसके मन में कोई कामना नहीं होती वह अपनी आत्मा को पाकर सन्तुष्ट रहता है। उसकी बुद्धि निश्चल समझो। जिसे सुख से खुशी नहीं होती, रोग, भय, क्रोध आदि जिसके पास नहीं आते हैं वह निश्चल बुद्धि है।

वीर अर्जुन जिसका किसी पदार्थ से स्नेह नहीं और जो किसी वस्तु को पाकर हर्षित नहीं होता वहु विद्वान है। जैसे केंचुआ अपने सब अंगों को सिकोड़ लेता है वह मनुष्य उसी तरह अपने इन्द्रियों को उसके विषयों में लपेट लेता है। विद्वान, ज्ञानी पुरुष को ईश्वर के दर्शन करने से विषय वासना दूर हो जाती है। इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल और लोभ कारक हैं। इन्द्रियों को वश में करना ही सबसे बड़ी विजय है। जिस मनुष्य ने अपना मन वश में कर लिया वही महान है वही ज्ञानी है। उसे ही आत्मिक शान्ति मिलती है।

जिस व्यक्ति ने अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं किया उसको बुद्धि कभी स्थिर नहीं होती। जिसका मन शान्त नहीं उसे शान्ति नहीं मिल सकती । जिसका जिसका मन शान्त नहीं है उसे न प्रभु मिलते हैं और न उसे सुख मिलता है।

हे अर्जुन – सागर में बहुत-सी नदी और नालों का जल गिरता है परन्तु फिर भी सागर अचल और प्रतिष्ठित रहता है। अथात् वह अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता है। इसी प्रकार बुद्धिमान पुरुष भी सब कामनाओं को अपने अन्दर समाहित कर लेता है और उसकी शान्ति बनी रहती है। परन्तु कामनाओं की इच्छा करने वालों की शान्ति भंग रहती है।

जो पुरुष सारी कामनाओं को छोड़कर निःस्वार्थ सोचता है तथा ममता और अहंकार को छोड़ देता है वही शान्ति पाता है। मैंने तुमसे यह ब्रह्मज्ञान की बात कही है। ब्रह्मज्ञानी निष्ठा को पाकर फिर इस संसार की माया के मोह में नहीं फँसता। अंत समय में जो कोई क्षणं भर के लिए भी इस ब्रह्मज्ञान की निष्ठा में स्थिर होता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है।

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तीसरा अध्याय (3rd chapter of Bhagavad Gita in Hindi)

Bhagavad Gita chapter 3 – Bhagwat Geeta adhyay 3 | गीता का तीसरा अध्याय

भगवान श्रीकृष्ण की ब्रह्मज्ञान की बात सुन अर्जुन ने पूछा-हे प्रभु ! यदि आपने कर्मों की अपेक्षा ज्ञान को श्रेष्ठ माना है तो आप मुझे इस भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं ? मुझे तो ऐसी बात बताइए जिससे मेरा कल्याण हो जाए।

निष्पाप अर्जुन ! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मैंने पहले कहीं है।

ज्ञानियों के ज्ञान भोग से और भोगियों के निष्काम कर्मयोग से। किन्तु किसी भी मार्ग के अनुसार कर्म को अपना स्वरूप त्याग देने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मनुष्य न तो कर्म के न करने से निष्कर्म को प्राप्त होता है और न ही कर्म को त्यागकर भगवत्साक्षात्कार रूप सिद्धि को प्राप्त होता है ।।

अतः सर्वथा कर्मों का स्वरूप से त्याग भी नहीं हो सकता क्योंकि भी पुरुष किसी काल में क्षण मात्र भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। नि:संदेह सभी पुरुष प्रकृति से उत्पन्न हुए गुणों द्वारा परवश हुए कार्य करते हैं।

इसलिए जो मूढ़ बुद्धि पुरुष कामेन्द्रियों के वश में होकर इन्द्रियों के भोगों की मन में चिंता करता है वह मिथ्याचारी अथवा दम्भी कहा जाता है और जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त होकर, कामेन्द्रियों से कर्म भोग का आचरण करता है श्रेष्ठ है। इसलिए तुम शास्त्र विधि द्वारा नियत स्वधर्म रूपक करो क्योंकि कर्म को न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ कर्म न करने से तुम अकर्मण्य कहलाओंगे।

हे अर्जुन – बन्धनों के भय से कर्मों का त्याग करना भी योग्य नहीं है, क्योंकि यज्ञ अर्थात् विष्णुजी के निमित किए हुए कर्म के अतिरिक्त अन्य कर्म में लगा हुआ मनुष्य कर्मों द्वारा बंधता है। इसलिए मैं तो तुमसे यही कहूँगा कि आसक्ति से रहित इस परमेश्वर के निमित भलीप्रकार आचरण कर कर्म न करने से तुम पाप के भागी बनोगे क्योंकि प्रजापति ब्रह्माजी ने यज्ञ सहित प्रजा को रचकर कहा कि यज्ञ द्वारा तुम लोग वृद्धि को प्राप्त करो और यह यज्ञ तुम लोगों की मनोवांछित कामनाओं को देने वाला हो। तथा तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो और वे देवता तुम लोगों की उन्नति करें।

इस प्रकार आपस में कर्त्तव्य समझकर उन्नति करते हुए परम कल्याण को प्राप्त करोगे तथा यज्ञ द्वारा बढ़ाए हुए देवता लोग बिना माँगे ही प्रिय वस्तुओं को देंगे । इनके द्वारा दिए गए भोगों को जो पुरुष बिना दिए ही भोगता है वह निश्चित ही चोर है।

यज्ञ से शेष बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठजन सब पापों से छूट जाते हैं। जो प्राणी अपने शरीर के पोषण के लिए ही पकाते हैं वे पाप के भागी बनते हैं क्योंकि सम्पूर्ण प्राणी अन्न से पोषित होते हैं। अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, यज्ञ से होती है और यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होने वाला है तथा कर्म को तुम वेद से पैदा हुआ जानो। वेद अविनाशी परमात्मा द्वारा पैदा हुए हैं। इससे सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है।’

हे पार्थ – जो पुरुष इस लोक में सृष्टि चक्र के अनुसार नहीं चलता, अर्थशास्त्र के अनुसार कर्म को नहीं करता, वह इन्द्रियों के सुख को भोगने वाला पुरुष का जीवन व्यर्थ हो जाता है। जो मनुष्य आत्मा से ही प्रीति रखने वाला, आत्मा में भगवान के दर्शन करने वाला तथा आत्मा से सन्तुष्ट रहने वाला होता है उसके लिए कोई कर्त्तव्य नहीं है क्योंकि उसका सम्पूर्ण भूतों में से कुछ भी स्वार्थ का सम्बन्ध नहीं रहता है तो भी उसके द्वारा केवल हित के कर्म किए जाते हैं।

इसलिए तुम अनासक्त होकर निरन्तर कर्तव्य कर्म का अच्छी प्रकार से आचरण करो क्योंकि अनासक्त कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त करता है। श्रेष्ठ पुरुष जो भी उच्चरण करते हैं अन्य पुरुष उसी का अनुसरण करते हैं। वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है अन्य लोग भी उसके अनुसार बरताव करते हैं।

इसलिए हे पार्थ – यद्यपि मुझे तीनों लोकों में कुछ भी कर्तव्य नहीं है तो भी मैं कर्म में ही बसता हूँ। यदि मैं सावधान न हुआ तो कर्म भी सावधान न होंगे। यदि मैं कर्म न करूँ तो सब लोग भ्रष्ट हो जायेंगे। इसलिए मैं तुम्हें यह बात फिर समझाता हूँ कि जो मनुष्य जैसा कर्म करेगा उसे वैसा ही फल प्राप्त होगा।

ज्ञानी पुरुषों को चाहिए कि अज्ञानियों के लिए कोई श्रद्धा मन में न रखें, किन्तु स्वयं परमात्मा के स्वरूप में स्थिर होकर सब कर्मों को अच्छी तरह करते हुए उनसे भी वैसे ही करवायें।

हे अर्जुन – वास्तव में सम्पूर्ण कर्म प्राकृतिक गुणों द्वारा किए हुए हैं तो भी अहंकार से मोहित हुए अन्त: करण वाला मनुष्य, मैं कर्ता हूँ ऐसा मान लेता है । परन्तु हे महाबाहो, गुण तथा कर्म के तत्त्व को जानने वाला ज्ञानी पुरुष सम्पूर्ण गुण गुणों में बसते हैं, ऐसा मानकर आसक्त नहीं होता है।

प्रकृति के गुणों से भरे पुरुष गुण और कर्मों में आसक्त होते हैं। उन मूर्ख और अज्ञानी लोगों से भली भाँति समझने वाले पुरुष दूर ही रहे।

इसलिए हे अर्जुन ! तुम ध्यानपूर्वक सच्चे मन स कर्मों को मुझमें समर्पण करके सब कुछ भूलकर युद्ध करो। यह बात याद रखो जो भी प्राणी मुझपर विश्वास करते हैं उन्हें किसी बात की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। उनकी आत्मा का डर सदा के लिए समाप्त हो जाता है। जो लोग अज्ञानी हैं वही डरते हैं।

हर प्राणी अपने मनोवृत्ति के अनुसार ही कर्म करता है। जैसे ज्ञानी अपनी मनोवृत्ति के अनुसार कार्य करता है ऐसे में किसी की जिद क्या काम करेगी।

इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह इन्द्रियों के वश में न रहे अर्थात् इन्द्रियों के भोग में जो राग और दोष हैं उन दोनों के वश में न हों क्योंकि ये दोनों ही उसके कल्याण मार्ग में शत्रु हैं । इन दोनों को ही जीतकर धर्म का पालन करें। धर्म के लिए मरना भी कल्याणकारी होता है।

अर्जुन ने श्रीकृष्ण की मधुरवाणी को सुनकर पूछा कि हे भगवान् फिर यह मनुष्य न चाहते हुए भी पाप क्यों करता है ?

हे अर्जुन – रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बड़ा पापी है। इसलिए तुम इसे अपना शत्रु मानो जैसे धुएँ से आग और धूल से दर्पण ढक जाता है वैसे ही उस काम क्रोध से ज्ञान ढक जाता है। इन्द्रियाँ मन और बुद्धि को अशुद्ध करती हैं। मनुष्य तो अपने काम जाल में फंसकर उनका शत्रु बन जाता है।

इसलिए हे पार्थ – पहले तुम इन्द्रियों को अपने वश में करो। ज्ञान के इस सबसे बड़े शत्रु को मार डालो। अपने आप पर विश्वास रखो। यह मत कहना कि मैं इन पर विजय नहीं पा सकता। यह तुम्हारी भूल है। तुम्हें अपने अन्दर आत्म शक्ति पैदा करनी होगी। इन इन्द्रियों से आगे मन है और बुद्धि से भी अत्यन्त परे आत्मा है। इसलिए तुम बुद्धि की शक्ति से आत्मा को वश में करो। अपनी शक्ति को समझो और शत्रु को यम रूप है उसे मार डालो।


चौथा अध्याय (4th chapter of Bhagavad Gita in Hindi)

Bhagavad Gita chapter 4 – Bhagwat Geeta adhyay 4 | गीता का चौथा अध्याय

श्रीकृष्ण जी इसके पश्चात् अर्जुन से बोले – हे अर्जुन – मैंने इस अविनाशी योग को कल्प के आदि में सूर्य के प्रति कहा था और सूर्य ने अपने पुत्र मनु से कहा था। इसके पश्चात् मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु से कहा। इस तरह से इस ज्ञान को राजर्षियों ने जाना। परन्तु वह योग बहुत समय से पृथ्वी पर ले लोप हो गया है।

अब वही योग मैंने तुमसे कहा है क्योंकि एक ओर तुम मेरे भक्त हो और दूसरी ओर मित्र हो। इसलिए तुम इस महायोग को समझकर अपने जीवन में नया परिवर्तन लाओ। इस मोह माया के जाल से बाहर निकलकर संसार को धर्म और ज्ञान का सन्देश दो।

अर्जुन ने श्रीकृष्ण से ज्ञान मार्ग जानकर पूछा हे श्रीकृष्ण, आपका जन्म तो अब हुआ है और सूर्य का जन्म तो बहुत पुराना है। इस योग को आपने सूर्य से कहा था यह कैसे सम्भव है ?

इस प्रश्न पर श्रीकृष्ण जी हँसकर बोले – हे मेरे प्रिय भक्त अर्जुन – मेरे और तुम्हारे बहुत जन्म हो चुके हैं, किन्तु तुम उन जन्मों को नहीं जानते, न ही जान सकते हो। यह केवल मैं ही जानता हूँ। मेरा जन्म साधारण प्राणियों जैसा नहीं है। मैं अविनाशी स्वरूप होने पर भी तथा सब भूत प्राणियों का ईश्वर होने पर भी प्रकृति को आधीन करके योग माया की शक्ति से प्रकट होता हूँ।

हे अर्जुन – जब-जब भी धरती पर धर्म की हानि होती है और अधर्म फैलने लगता है तब-तब मैं जन्म लेता हूँ। क्योंकि धर्मी पुरुषों का उद्धार करने के लिए और पापियों का नाश करने के लिए तथा धर्म की रक्षा के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूँ।

इसलिए अर्जुन मेरा जन्म और कर्म अलौकिक है। इसलिए जो पुरुष ईश्वर को जानता है, वह शरीर को त्यागकर दुबारा जन्म नहीं लेता है। पहले भी राग, भय, क्रोध मोह से दूर रहकर बहुत से लोग मेरी शरण में आकर अपना जीवन सफल कर चुके हैं। उनका कल्याण मैंने इसलिए किया है कि उन्हें ज्ञान प्राप्त हो चुका है।

जो मुझे जैसे याद करता है मैं उसे वैसे ही याद करता हूँ। इस रहस्य को जानकर ही बुद्धिमान प्राणी हर तरह से मेरे बताये हुए ज्ञान को प्राप्त करते हैं। जो मुझे तत्त्व (ईश्वर) से नहीं जानते ऐसे प्राणी इस संसार में कर्मों के फल को चाहते हुए देवताओं को पूजते हैं। ऐसे लोगों के सभी मनोरथ पूरे होते हैं किन्तु उन्हें मेरी प्राप्ति नहीं होती। इसलिए तुम केवल मुझे ही याद रखो और मेरी ही पूजा करो। तत्व सर्वशक्तिमान परमात्मा अजर अविनाशी है।

पाण्डव पुत्र अर्जुन गुण और कर्मों के हिसाब से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनाये गये हैं। उनका कर्ता भी मैं ही हूँ, क्योंकि हर प्राणी के कर्मों का फल उसे मिलता है। जैसा कोई कर्म करता है, मैं उसके भाग्य में वह लिखता हूँ। इसलिए तुम पूर्वजों द्वारा सदा से किए हुए कर्म ही करो । परन्तु कर्म क्या है, अकर्म क्या है इस विषय पर बुद्धिमान प्राणी भी उलझ से जाते हैं।

कर्म का स्वरूप भी जानना और बुरे कर्मों का ज्ञान प्राप्त होना चाहिए तथा निषिद्ध कर्म के बारे में जानना चाहिए क्योंकि कर्म की गति गहन है। जो प्राणी कर्म में अर्थात् अहंकार से दूर की हुई सारी चेष्टाओं में अकर्म अर्थात् वास्तव में उनका न होना बिना देखे जो प्राणी अधर्म में भी अर्थात् अज्ञानी प्राणियों द्वारा किए हुए सारी क्रियाओं के त्याग में भी कर्म को यानि त्याग रूप क्रियाओं को देखे वही बुद्धिमान होता है।

हे अर्जुन – जिसके सारे कार्य, कामना और संकल्प से दूर हैं ऐसे अज्ञान रूपी आग द्वारा भस्म हुए कर्मों वाले प्राणियों को ज्ञानी लोग भी पंडित कहते हैं। जो पुरुष संसार से दूर भगवान की लग्न में लगे हुए हैं। उसी को अपना सम्पूर्ण जीवन समझते हैं, वे कर्मों के फल अर्थात् कर्तव्य अभियान को त्यागकर कर्म के साथ अच्छी तरह बर्ताव करते हुए भी कुछ नहीं करते हैं। जिन्होंने शरीर और अन्तः करण को जीत लिया है और सारी सम्भोग सामग्री त्याग दी है।

ऐसे प्राणी यदि शरीर सम्बन्धी कर्म को करते भी हैं तो पापी नहीं कहलाते। अपने आप जो कुछ प्राप्त होता है जो कभी मिलता है उसी में सन्तुष्ट रहने वाले, ईर्ष्या जलन से दूर रहने वाले प्राणी कर्मों की मार से भी बँधते नहीं हैं क्योंकि आसक्ति से रहित ज्ञान में डूबे हुए मनवाले यज्ञ के लिए आचरण करते हुए युग पुरुषों के सारे कर्म नष्ट हो जाते है।

यज्ञ के लिए आचरण करने वाले प्राणियों में से कोई तो इस भाव से यज्ञ करता है कि अर्पण भी ब्रह्मा है और हवन करने योग्य द्रव्य भी ब्रह्मा है और उसी ब्रह्मा का रूप हवन कुण्ड भी है। हवन सामग्री भी जब आग में डाली जाती है वह ब्रह्मा ही है। इसलिए ब्रह्म रूप कर्म में समाधिस्थ हुए उस पुरुष द्वारा जो प्राप्त होने योग्य है, वह भी ब्रह्मा ही है। और दूसरे भोगी लोग देवताओं के पूजन रूप यज्ञ को ही अच्छी तरह से पूजते हैं और अन्य ज्ञान लोक पर ब्रह्मा ईश्वर रूपी आग में ही यज्ञ के द्वारा इसमें हवन करते हैं।

अन्य लोग भक्त इन्द्रियों का संयम यथा स्वाधीनता रूपी आग में हवन करते हैं। यानी इन्द्रियों को रोककर अपने वश में कर लेते हैं और दूसरे योगी शब्दादिक विषयों को इन्द्रिय रूपी आग में हवन करते हैं। वह इन्द्रियों को ग्रहण करते हुए भस्म कर देते हैं। अन्य योगीजन इन्द्रियों की चेष्टाओं और प्राणों के व्यापार के ज्ञान से प्रकाशित हुई परमात्मा में स्थित रूपी योग की आग में हवन करते हैं।

अन्य कई प्राणी ईश्वर को अर्पण बुद्धि से लोक सेवा में द्रव्य लगाने वाले हैं। वैसे ही कई प्राणी सर्वधर्म पालन करने वाले और यज्ञ करने वाले हैं। इनमें से कई ऐसे प्राणी भी हैं जो कई प्रकार के यज्ञ करने वाले हैं, दूसरे कई प्राणी अहिंसा व्रत करके भगवान की पूजा तथा शास्त्रों का अध्ययन करके ज्ञान रूपी यज्ञ करते हैं।

दूसरे योगीजन अमानवायु में प्राणवायु का हवन करते हैं। जैसे कई योगी प्राणवायु का हवन करते हैं, वैसे कई अन्य योगी प्राणायाम करके परायण करते हैं। अन्य नियिमित आहार करने वाले योगीजन प्राणों को प्राणों में ही हवन करते हैं। इस प्रकार यज्ञों द्वारा पाप का नाश करते हैं।

हे पार्थ – यज्ञों के परिणाम रूप ज्ञानामृत को भोगने वाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं । जो पुरूष इस मृत्यु लोक में दूसरों को सुख नहीं दे सकता वह परलोक में सुख की आशा कैसे रख सकता है। ऐसे बहुत प्रकार के यज्ञ वेद में लिखे गए हैं। उन सबके शरीर, मन और इन्द्रियों को क्रिया द्वारा ही उत्पन्न होने वाले ज्ञान तत्व को जानकर निष्काम कर्म योग द्वारा संसार बंधन से मुक्त हो गए हैं।

हे अर्जुन – सांसारिक वस्तुओं से सिद्ध होने वाले यज्ञ से ज्ञान रूपी यज्ञ सब प्रकार से श्रेष्ठ है क्योंकि सम्पूर्ण यज्ञ मात्र कर्म ज्ञान में शेष होते हैं अर्थात् ज्ञान उनकी पराकाष्ठा है। इसलिए तत्व को जानने वाले ज्ञानी पुरुषों से भली प्रकार दण्डवत् प्रणाम तथा सेवा और निष्कपट भाव से किए प्रश्न करो ।

उस ज्ञान को जान वे मर्म को जानने वाले ज्ञानीजन तुझे उस ज्ञान का उपदेश देंगे जिसको जानकर तुम इस प्रकार के मोह को प्राप्त नहीं होंगे और हे पाण्डव वीर जिस ज्ञान के द्वारा सर्वव्यापी अनन्त चेतन रूप हुए अपने अन्तर्गत बुद्धि की शक्ति से सारे भूतों को देखोगे और उसके पश्चात् मेरे में पूरे विश्व के ज्ञान को देखोगे। यदि तुम सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो, फिर ज्ञान की शक्ति से इन पापों से मुक्त हो सकते हो।

हे अर्जुन – जैसे प्रज्जवलित आग सम्पूर्ण कर्मों को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञानरूपी आग सारे कर्मों को भस्म कर देती है। इसलिए इस संसार में ज्ञान के सिवा ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो पवित्र कर सके। ज्ञान महाशक्ति है, इस ज्ञान को पाने के लिए तप, त्याग, योग द्वारा अच्छी तरह शुद्धांतकरण से आत्मा में अनुभव होता है।

हे पार्थ – जितेन्द्रिय तत्पर हुआ श्रद्धावान प्राणी ज्ञान को प्राप्त होता है, ज्ञान के प्राप्त होने पर मन को शान्ति मिलती है ऐसे ही भगवत विषयों को न जानने वाले तथा श्रद्धाहीन प्राणी परमार्थ से भ्रष्ट लोगों के लिए न तो सुख है और न शान्ति, न ही परलोक है अर्थात् लोक और परलोक दोनों ही उसके लिए भ्रष्ट हो जाते हैं।

जिसने समत्व बुद्धिरूप योग द्वारा भगवत् अर्पण कर दिया हो, जिसके सारे कर्म अज्ञान द्वारा नष्ट हो गए हो। इनके विषय में तुम इतना ही सोच लो कि वे क्या कर सकते हैं। तुम ऐसे लोगो से युद्ध करने में संकोच क्यों करते हो। बुराई का विनाश करना तो ज्ञानी का कर्तव्य है। उठो अर्जुन युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।।

मैं ही तुम्हारा कर्म हूँ, मैं ही तुम्हारा रक्षक हूँ। तुम धर्म की रक्षा करो। मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा।


पाँचवाँ अध्याय (5th chapter of Bhagavad Gita in Hindi)

Bhagavad Gita chapter 5 – Bhagwat Geeta adhyay 5 | गीता का पाँचवाँ अध्याय

भगवान श्रीकृष्ण के मुख से यह ज्ञान वाणी सुनकर अर्जुन ने कहा-हे प्रभु ! आप कर्मों को संन्यास की ओर फिर निष्काम कर्म योग की प्रशंसा करते हैं। इसलिए इनमें से एक जो निश्चय किया हुआ कल्याणकारी मार्ग है, उसके बारे में मुझे बताओ।

देखो अर्जुन सर्वप्रथम तुम्हें कर्मों का संन्यास जिसे मन, इन्द्रियों और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्त्तापन का त्याग और निष्काम कर्मयोग, (समत्व बुद्धि से भगवत् का अर्थ कर्मों का करना) यह दोनों परम कल्याण के करने वाले हैं परन्तु उन दोनों में से या कर्मों के संन्यास से निष्काम कर्म योग साधन में सुगम होना श्रेष्ठ है।

इसलिए जो प्राणी न किसी का बुरा करता है और न ही किसी बुरे के पास जाता है वह निष्काम कर्म योगी सदा संन्यासी ही समझा जाता है। क्योंकि बुराइयों और पापों से मुक्त प्राणी सुखपूर्वक संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।

हे अर्जुन – ऊपर कहे हुए संन्यास और निष्कर्म कर्मयोग को मूर्ख लोग अलग-अलग फल वाले कहते हैं न कि पंडितजन। क्योंकि दोनों में से एक में अच्छी प्रकार स्थित हुआ प्राणी दोनों के फलस्वरूप परमात्मा को प्राप्त होता है। ज्ञान योगियों द्वारा जो परम-धर्म प्राप्त किया जाता है वही निष्काम कर्म योग द्वारा भी प्राप्त किया जाता है।

इसलिए पुरुष ज्ञान योग और निष्काम योग का फल एक ही समझता है वह ही यथार्थ देखता है। परन्तु हे वीर श्रेष्ठ ! निष्काम कर्म योग बिना संन्यास यथार्थ इन इन्द्रियों और शरीर द्वारा होने वाले सारे कर्मों में कर्त्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है। और भगवत् स्वरूप का मनन करने वाला निष्काम कर्म योगी ईश्वर को शीघ्र प्राप्त कर लेता है। जिसने शरीर वश में किया हुआ है ऐसे जितेन्द्रिय और विशुद्ध अन्तःकरण वाला एवं सारे प्राणियों के आत्मरूप परमात्मा में एकीकृत हुआ निष्कर्म कर्म योगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता है।

हे अर्जुन – तत्व को जानने वाला सांख्य योगी को देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, भोजन करता हुआ, बोलता हुआ, त्याग करता हुआ, ग्रहण करता हुआ, आँखें झपकाता हुआ और कल्पना सागर में डूबता हुआ भी समस्त इन्द्रियाँ अपने अपने अर्थ में प्रयोग में लाई जा रही हैं। इस प्रकार समझता हुआ निःसन्देह ऐसा माने के मैं कुछ भी नहीं करता हूँ।

हे अर्जुन – देहाभिमानियों द्वारा यह साधना कठिन है और निष्काम कर्मयोग सुगम है, क्योंकि जो पुरुष सत्व कर्मों को परमात्मा को अर्पण करके और आसक्त का त्याग करके कर्म करता है वही प्राणी पाप मुक्त होकर युद्ध हो जाता है। इसलिए निष्काम कर्मयोगी सत्व संसार के सुखों को त्यागकर मन को आत्मा की शुद्धि के लिए कर्म करता है। इसी से निष्काम कर्मयोगी कर्मों के फल को परमेश्वर को अर्पण करके भगवत प्राप्त रूपी शान्ति को प्राप्त करता है और सकामी पुरुष फल में आसक्त हुआ कामना के द्वारा बंध जाता है। इसलिए निष्काम भोग सबसे उत्तम है।

प्रिय अर्जुन – जिसके वश में अन्त.करण है ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष तो न संदेह कर्ता हुआ और न ही करवाता हुआ नौ द्वारों वाले शरीर रूपी घर में सारे कर्मों को मन से त्यागकर आनन्दपूर्वक सच्चिदानन्द परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है। परमेश्वर भी प्राणियों के न कर्त्तापन को ओर न कर्मों को तथा न ही कर्मों के फल के संयोग को वास्तव में रचता है किन्तु परमात्मा के संकेत से प्रकृति ही व्यवहार करती है।

सर्वव्यापी ईश्वर न किसी के पास कर्म को और न किसी अच्छे कर्म को ग्रहण करता है किन्तु माया द्वारा ज्ञान ढका हुआ है । इससे अब जीव मोहित हो रहे हैं परन्तु जिनका अन्तःकरण का अज्ञान आत्मा द्वारा नष्ट हो गया है उनका वह ज्ञान सूर्य के सदृश सच्चिदानन्द धन परमात्मा को प्रकाश में लाता है।

ऐसे ज्ञानी जन जो विद्या और चिनमययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते, चाण्डाल में भी समभाव से देखते हैं। इसलिए जिनका मन समग्र में स्थित है उन्होंने तो उसके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही संसार जीत लिया है क्योंकि ईश्वर निर्दोष और सम है । इसमें संसार का स्वाी ईश्वर ही स्थित है।

जो प्राणी अपने प्रिय को पाकर खुश नहीं है और अप्रिय को उसको प्राप्त होकर उर्द्धववान न हो ऐसा स्थिर बुद्धि संशय रहित ब्रह्मवेत्ता पुरुष में एकीकृत या वैसे नित्य स्थित है। बाहर के विषयों (सांसारिक भोग) में आसक्ति सहित अन्तःकरण वाला पुरुष अन्तः करण में जो भगवत ध्यान जनित आनन्द है, उसको प्रापत होता हैऔर वह पुरुष सच्चिदानन्दन परब्रह्म परमात्मा रूप योग में एकीकृत भाव में स्थित हुआ अक्षय आनन्द को प्राप्त करता है।

जो इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं वे यद्यपि विषयी पुरुषों को सुखरूपा मानते हैं तो भी निःसन्देह दुख ही देने वोले हैं और यदि अन्तःकरण वाले अर्थात् अनित्य हैं, इसलिए प्रिय अर्जुन बुद्धिमान विवेकी प्राणी उसमें नहीं रमता’।

जो प्राणी शरीर के नाश होने से पहले ही काम क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन करने में समर्थ है, जिन्होंने काम क्रोध को जीत लिया है वही इस संसार में योगी है और उन्होंने ही अपने पाप को जीतकर ईश्वर को पा लिया है। जो प्राणी निश्चय करके अन्तर आत्मा में ही सुख वाला है और आत्मा में ही आराम वाला है तथा जो आत्मा से ही ज्ञान वाला है ऐसा प्राणी ईश्वर के साथ एकीभाव सांख्य योगी शान्त ब्रह्मा को प्राप्त होता है।

जिसके सारे पाप नष्ट हो गए हैं तथा वे ज्ञान पाकर निवृत्त हो गए है, रति जिनका एकाग्र हुआ है, जिसका ध्यान ईश्वर के ध्यान में लगा हुआ है, ऐसे भद्र पुरुषों को ईश्वर प्राप्त होता है । काम क्रोध से मुक्त जीते हुए चित्त वाले परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार किए हुए ज्ञानी पुरुषों के लिए सब ओर से ईश्वर की कृपा होती है । ईश्वर ही उसकी रक्षा करता है।

हे अर्जुन – बाहर के विषयों, भोगों का चिन्तन न करता हुआ बाहर ही त्यागक नेत्रों की दृष्टि भृकुटि के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को समग्र करके जीती हुई है । इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि जिसकी परमेश्वर की इच्छा से डर क्रोध से रहित है. वह सदा मुक्त ही है।

हे अर्जुन – मेरा भक्त मेरे को यज्ञ और तपों को भोगने वाला और सम्पूर्ण लोगों को भी ईश्वर तथा सम्पूर्ण भूत प्राणियों को निःस्वार्थ प्रेम ऐसा तत्व से जानकर शांति को प्राप्त होता है। सच्चिदानन्द परिपूर्ण शान्त ब्रह्मा के सिवाय उसकी दृष्टि में और कुछ भी नहीं रहता है।

केवल वासुदेव ही वासुदेव रह जाता है।

हे मेरे प्रिय अर्जुन अब तुम भी इस माया मोह के जाल से बाहर निकलो। यह तो जीवन के ऐसे अँधेरे हैं जिन्हें केवल ज्ञान का प्रकाश ही मिटा सकता है।


छठा: अध्याय (6th chapter of Bhagavad Gita in Hindi)

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Bhagavad Gita chapter 6 – Bhagwat Geeta adhyay 6 | गीता का छठा: अध्याय

अनाश्रितः कर्मफल कार्य करोति च ।
स सन्याशी च योगी च न निरग्रिन चक्रिय ॥

श्रीकृष्ण जी बोले हे अर्जुन – जो कर्म के फल को न चाहता हुआ करने योग्य कर्म करता है वह संन्यासी और योगी और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी योगी नहीं है। क्रियाओं को त्याग करने वाला संन्यासी भी योगी नहीं है।

हे अर्जुन – जिसको संन्यासी भी ऐसा करते हैं उसी को तू योग जान क्योंकि संकल्पों को न त्यागने वाला कोई पुरुष योगी नहीं होता।

समत्व बुद्धिमान योग के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करते हेतु कहा है और योगारूढ़ पुरुष के लिए सर्व संकल्पों का अभाव कल्याण हेतु कहा है।

उस काल में न तो इन्द्रियों में आसक्त होता है तथा न कर्मों में ही आसक्त होता है। उस काल में सर्व संकल्प का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है।

यह योग रूढ़ता कल्याणमयी कही जाती है । इसलिए प्राणी को चाहिए कि अपने द्वारा अपने संसार रूपी सागर से उद्धार करे और अपनी आत्मा को अधोगति में न पहुँचाए । क्योंकि यह जीव आत्मा आप ही अपनी मित्र है। यही प्राणी शत्रु भी है । उसे इससे बड़ा न तो कोई प्राणी का मित्र है, और न ही शत्रु है । उस जीवात्मा का तो आप ही मित्र हैं, जिसने अपनी शक्ति से मन और शरीर जीता हुआ है। यह उस समय शत्रु होता है जब आप मन, शरीर और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त न कर सकें।

हे अर्जुन – सर्दी – गर्मी, सुख-दुख तथा मान-अपमान में जिसके अन्त:करण की वृत्तियाँ अच्छी प्रकार शान्त हैं अर्थात् विकार रहित हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मा वाले पुरुष के ज्ञान में ईश्वर की शक्ति के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। यानि ईश्वर की शक्ति के सिवाय और कुछ है ही नहीं अर्थात् ईश्वर ही उस आत्मा में विराजमान है।

जिसका अन्तःकरण ज्ञान विज्ञान से तृप्त है तथा विकार रहित है, स्थिति पर जिसने अच्छी प्रकार विजय पाई हुई है, जिसके लिए मिट्टी, पत्थर, सुवर्ण समान है, वह योग युक्त अर्थात् भगवान की प्राप्ति वाला है, ऐसा कहा जाता है।

जो प्राणी सबका हित करने वाला है, जो शत्रु से उदासीन मध्यस्थ, द्वेषी और बन्धुगणों में तथा धर्मात्माओं में और पापियों में भी विराजमान है, अति उत्तम है। इसलिए उचित है कि जिसका मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, ऐसा वासना रहित और संग्रहरहित योगी एकान्त में बैठकर आबादी से दूर अपने मन को सच्चे हृदय से ईश्वर के ध्यान में लगाए।

मन को एकाग्र करके मन और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में करे अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे। उसकी विधि इस प्रकार है मन को दृढ़ करके अपनी नासिका के अग्रभाग को देखकर अन्य दिशाओं को देखता हुआ ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित होकर, भय रहित शुद्ध मन से सावधान होकर अपने चित को मेरे ध्यान में लगाकर मुझे वरण कर ले।

इस प्रकार आत्मा को निरन्तर मेरे स्वरूप में लगाकर स्वाधीन मन वाला योगी अपने अन्दर मन की शान्ति को पा लेता है।

परन्तु हे अर्जुन – यह योग न तो बहुत खाने वाले को सिद्ध होता है और न बिलकुल खानेवाले को तथा अतिशयन करने वाले स्वभाव वाले को और न अत्यन्त जागने वाले को ही सिद्ध होता है। यह दुखों का नाश करने वाला योग तो यथा योग्य आहार और विहार करनेवालों को तथा कार्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वालों को और यथायोग्य शयन करने तथा यथायोग्य जागने वालों को ही सिद्ध होता है।

इस प्रकार योग के अभ्यास में पूरी तरह वश में किया हुआ मन जिस काल में परमात्मा में भली प्रकार स्थित हो जाता है उस काल में सम्पूर्ण कामनाओं से रहित स्थान में स्थित होता है वैसे ही परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए मन को कहा गया है ।

हे अर्जुन – जिस अवस्था में योग के अभ्यास से विरूद्ध हुआ दिल उपराम हो जाता है और जिन अवस्थाओं में परमेश्वर के ध्यान से शुद्ध हुई सूक्ष्म आत्मा द्वारा परमात्मा को साक्षात करता हुआ जगत का स्वामी ईश्वर भी सन्तुष्ट हो जाता है। इन्द्रियों से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि ग्रहण करने योग्य हो अनन्त आनन्छ है उसको जिस अवस्था में योगी अनुभव करता है और जिस अवस्था में स्थित हुआ योगी भगवत स्वरूप से चलायमान नहीं होता।

परमेश्वर की प्राप्ति रूप जिस लय को प्राप्त होता है उससे बढ़कर कोई लाभ नहीं मानता है और भगवत स्वरूप जिस अवस्था में स्थित हुआ योगी बड़े भारी दुख से भी प्रभावित नहीं होता है। जो दुख से भरे संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसे जान लेना चाहिए कि इसे सच्चे मन और पूर्ण लग्न से ही करना । उचित है।

प्राणी को चाहिए कि संकल्प से पैदा होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को निःस्पर्शयता से अर्थात् वासना और आसक्ति को त्यागकर और मन के द्वारा सभी इन्द्रियों को पूर्ण रूप से वश में करे । क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरामता को प्राप्त करे तथा शान्त बुद्धि से अपने मन को ईश्वर के ध्यान में लगाए । ईश्वर के अतिरक्ति और किसी का ध्यान न करे ।

जिसका मन पर अधिकार नहीं हुआ उसको चाहिए कि यह स्थिर न रहनेवाला और चंचल मन जिस प्रकार से सांसारिक विषयों में विचरता है उसे रोककर बारम्बार ईश्वर को याद करे । क्योंकि जिसका मन स्थिर हो गया है उसे ईश्वर से मिलने में कोई कठिनाई नहीं । ईश्वर भी उस पर कृपा दृष्टि करते हैं । वही योगी है । उसे ही ज्ञान प्राप्त होगा । जिसके पास यह ज्ञान है उसी के पास भगवान है । वही जीवन के सच्चे आनन्द को प्राप्त करता है ।

हे अर्जुन – सर्वव्यापी अनन्त चेतन में एकाग्र भाव से स्थित, रूप योग से युक्त हुए आत्मा वाला तथा सबमें समभाव से देखने वाला | योगी आत्मा की सम्पूर्ण रूपों में बर्फ में पानी देखता है और सारे भूतों की आत्मा में देखता है अर्थात् जैसे स्वप्न से जगा हुआ प्राणी स्वप्न के संसार को अपने सर्वव्यापी अनन्त चेतन आत्मा के अन्तर्गत संकल्प के आधार पर देखता है।

जो प्राणी भूतों को मुझ वासुदेव के अन्तर्गत देखता है, उसके लिए में अदृश्य नहीं हूँ और न वह मेरे लिए अदृश्य रहता है क्योंकि वह मेरे में एकीभाव से स्थित है। उस तरह से जो प्राणी एकीभाव में स्थित होकर सम्पूर्ण भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ सच्चिदानन्द वासुदेव को स्मरण करता रहता है वह योगी सब स्थानों पर रहता हुआभी मेरे मन में रहता है क्योंकि उसके अनुभव में मेरे अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं।

हे अर्जुन – जो योगी अपनी सदृश्यता से (जैसे मनुष्य अपने मस्तक, हाथ, पाँव और अन्य अंगों में भिन्न-भिन्न प्रकार का बरताव करता है) सम्पूर्ण भूतों में सब देखता है सुख दुख में समभाव रखता है, वह योगी सबसे महान और श्रेष्ठ माना गया है।

इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण के मुख से ज्ञान की बातें सुनकर अर्जुन बोला – हे मधुसूदन – यह ध्यान लोग आपने समत्वभाव से कहा है, इसको मैं मन के चंचल होने के कारण बहुत समय तक ठहरने वाली स्थिति में नहीं देखता हूँ क्योंकि हे भगवन – यह मन बड़ा ही चंचल है, चलायमान स्वभाव वाला है तथा बहुत शक्तिशाली है। इसलिए इसे वश में करना हवा को वश में करने की भाँति बहुत कठिन मानता हूँ।

अर्जुन की बात सुनकर श्रीकृष्ण बोले – हे अर्जुन – इसमें कोई संदेह नहीं कि मन बहुत चंचल और बड़ी कठिनाई से वश में आनेवाला है, परन्तु अपने आप पर काबू पाने के लिए मन को दृढ़ “करने और योग साधना करने से, वैराग्य से यह वश में होता है। इसलिए इसको वश में करना चाहिए क्योंकि जिस प्राणी का मन उसके वश में नहीं है, उसे योग का प्रापत होना कठिन है और स्वाधीन मन वाले प्रयत्नशील पुरुषों द्वारा साधना करने से मन को वश में करना सहज है, यह मेरा दृढ़ मत है ।

हे भगवान – मेरा मन योग से चलायमान हो गया है। जिसका ऐसा शिथिल हो, श्रद्धायुक्त पुरुष योग की सिद्धि को अर्थात् भगवत साक्षात्कारता को न प्राप्त होकर, किसी गति को प्राप्त होता है?

क्या यह मन भगवद् प्राप्ति के मार्ग में मोहित हुआ बेसहारा पुरुष घिरे हुए बादलों की भाँति दोनों ओर से अर्थात् ईश्वर को प्रापत करने के लिए सांसारिक योग से भ्रष्ट नहीं हो जाता? हे मधुसूदन ! मेरे इस संशय को दूर करने के लिए आप ही योग्य हैं, क्योंकि आपके सिवा दूसरा कोई इस संशय को दूर करने के लिए मिलना कठिन है।

हे अर्जुन – मैंने तुम्हारे सारे प्रश्न सुन लिए हैं, अब उनका उत्तर सुनो – योगी पुरुष का न तो इस लोक में और न ही परलोक में नाश होता है । क्योंकि कोई अच्छे काम करने वाला दुर्गति को प्राप्त नहीं होता । किन्तु योग से भ्रष्ट प्राणी पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त होकर उनमें बहुत वर्षों तक रहने के पश्चात फिर किसी आचरण वाले मनुष्य के घर में जन्म लेता है अर्थात् किसी योगी के घर में जन्म लेता है परन्तु इस बार का जन्म संसार में अति दुर्लभ है।

वह प्राणी वहाँ उस पहले के शरीर में साधन किए हुए बुद्धि के संयोग से अर्थात् समत्व बुद्धि योग से संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है । इस प्रभाव से फिर भलीभांति भगवत् प्राप्ति के निमित्त यह करता हैं।

यह (श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योग से भ्रष्ट प्राणी) विषयों के वश में हुआ भी उस पहले के अभ्यास से ही नि:संदेह भगवान की ओर आकर्षित किया जाता है तथा समत्व बुद्धि योगी का प्राणी भी वेद में कहे हुए समान कर्मों के फल उल्लंघन कर जाता है। जबकि इस प्रकार के प्रयत्न करनेवाला योगी भी परमगति को प्राप्त हो जाता है।

योगा स्वरूप को जानने की इच्छा करने वाला भी केवल योग को नहीं पाता है अपितु वेदोक्त कर्म फल से अधिक फल पाकर मुक्त

हो जाता है । योगी इस प्रकार प्रयत्न करता रहता है कि उसके पाप दूर हो जाते हैं और वह योग की सिद्धि पाकर परमगति को पाता है। म हे अर्जुन ! तपस्वियों, कर्मनिष्ठों और ज्ञानियों से योग ही श्रेष्ठ होता है।

इसलिए हे अर्जुन तुम योगी बनो और श्रद्धापूर्वक मुझमें मन लगाओ । जो मुझे याद करता है, जो मेरा भजन करता है, जो हर कार्य को करने से पहले सच्चे मन से मुझे अर्थात् ईश्वर को स्मरण करता है, वह सम्पूर्ण योगियों से श्रेष्ठ है । इससे प्रिय मुझे इस संसार में कोई और नहीं है।

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