Best Srimad Bhagavad Gita in hindi in detail – श्रीमदभगवदगीता के 18 अध्याय

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सातवाँ अध्याय (7th chapter of Bhagavad Gita online in Hindi)

Bhagavad Gita chapter 7 – Bhagwat Geeta adhyay 7 | गीता का सातवाँ अध्याय

हे पाण्डव पुत्र महाबलि धनुर्धर अर्जुन तुम अपना मन मुझमें ही लगाओं और मेरा ही सहारा लेकर संशय रहित होकर मुझको पूर्ण रीति से अपनाओ। मेरा कथन है जो इस ज्ञान को एक बार जान लेता है उसे फिर जानने के लिए कुछ नहीं बचा। अब ध्यान पूर्वक सुनो पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार, यह आठ प्रकार की भिन्न प्रकृति हैं। इस सत्य को जानकर ही अर्थात् चेतन प्रकृति जानकर ही सम्पूर्ण जगत का ज्ञान प्राप्त किया जाता है।

हे अर्जुन – तुम ऐसा समझो कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों में ही पैदा होने वाले हैं और मैं इस सम्पूर्ण संसार को पैदा करनेवाला हूँ और प्रलय रूप भी मैं ही हूँ। इसलिए मेरे सिवा इस संसार में और कोई कंचन मात्र भी वस्तु नहीं है। यह सारा संसार सूत्र में सूत्र मणियों के अन्दर मेरे साथ ही गया हुआ है।

हे अर्जुन – मैं जल में रस हूँ तथा चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश मैं ही हूँ। सारे वेदों में ओंकार हूँ तथा आकाश में शब्द और मानवों में मानवता हूँ। पृथ्वी पर गंध और आग में तेज हूँ। सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ अर्थात् जिसमें वे जीते हैं, वह मैं हूँ। मैं ही भक्तों की भक्ति हूँ। मैं ही तपस्वियों की तपस्या हूँ। इसलिए प्रिय अर्जुन, तुम सम्पूर्ण भूतों का सनातन कारण मुझे ही समझो। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।

मैं आसक्ति और कामनाओं से रहित अर्थात् सामर्थ्य हूँ और सब भूतों में धर्म के अनुकूल एवं शास्त्रों के अनुसार काम हूँ। और भी जो महत्व गुण से पैदा होने वाले भाव हैं, यह मेरे से ही होते हैं, ऐसा जान लो परन्तु वास्तव में उनमें और वे मुझमें नहीं हैं।

गुणों का कार्य रूप, सात्विक राजस और तामस इन तीनों प्रकार के भावों से अर्थात् रागद्वेषादि विकारों से और सम्पूर्ण विषयों से यह सारा संसार मोहित हो रहा है । इसलिए इन तीनों गुणों से दूर मुझ अविनाशी को तत्व से नहीं जानता।। क्योंकि यह अलौकिक अर्थात अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी योगमाया है जो बड़ी विचित्र है, परन्तु जो प्राणी मेरे ही नाम की माला हर समय जपते रहते हैं और मेरा भजन करते हैं वे माया के जाल को पार कर जाते हैं । इन बंधनों को तोड़ देते हैं । वे संसार के मायाजाल से मुक्त हो जाते हैं।

ऐसा सरल उपाय होने पर भी माया द्वारा बँधे हुए ज्ञानवान और आसुरी स्वभाव वाले तथा मानवता से गिरे हुए बुरे कर्म करने वाले पापी लोग तो मेरा नाम ही नहीं लेते, मेरी पूजा नहीं करते। यदि वे भूलकर मेरा नाम लेते भी हैं तो मैं उन पापी लोगों से दूर रहता हूँ और मृत्यु के पश्चात उन्हें नर्क में जाना पड़ता है।

प्रिय अर्जुन – तुम मेरे भक्त हो, उत्तम कर्म करने वाले कर्मवीर हो । तुम्हें मुझपर विश्वास है, मैं केवल अपने भक्तों का दास हूँ। जो लोग प्रात: मेरा भजन करते हैं, मैं सदा उनके हृदय में वास करता हूँ। मुझे अपने भक्तों से प्रेम है।यद्यपि यह सत्य है कि जो प्राणी उदास हयी, श्रद्धा पूर्वक मेरा भजन करते हैं उन्हें मैं उत्तम मानता हूँ, परन्तु ज्ञानी पुरुष तो साक्षात मेरा रूप ही है, ऐसा मेरा मत है क्योंकि यह स्थिर बुद्धिमान भक्त गति स्वरूप मेरे में स्थित है।

जो भक्त बहुत जन्मों के अन्त में तत्व ज्ञान ज्ञात करता है वह ज्ञानी सब तरह से वासुदेव ही है, अर्थात् इस संसार में वासुदेव के सिवा और कुछ नहीं है इसलिए जो मेरी पूजा करते हैं, सच्चे हृदय से मुझे याद करते हैं वे ही महात्मा हैं।

हे अर्जुन – जो विषयासाक्त हैं, वे तो अपने स्वभाव से घिरे हए हैं तथा उन भोगों की कामना द्वारा ज्ञान से भ्रष्ट हैं । उन नियमों को धारण करके अर्थात् जिस-जिस देवता की पूजा के लिए जो भी नियम इस संसार में प्रचलित हैं उन नियमों को अपनाकर (धारण करके) अन्य देवताओं की पूजा करते हैं और जो प्रभु भक्त जिस-जिस देवता को मन से पूजते हैं उन सब भक्तों के मन में उसी देवता के प्रति श्रद्ध को स्थिर करता हूँ।

जो पुरुष श्रद्धा से युक्त उत्त देवताओं को पूजते हैं, उन देवताओं से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए इच्छित भोगों को निसन्देह प्राप्त करते हैं।

परन्तु उन अल्प बुद्धि वालों का वह फल नाश्वान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं की पालते हैं । मेरे भक्तजन मुझे जैसे भी याद करें जैसे ही मेरी पूजा करें, वे मेरे को ही पा लेते हैं। ऐसा होने पर भी सब प्राणी मेरा भजन नहीं करते। इसका कारण यह है कि बुद्धिहीन, मन्दबुद्धि प्राणी यह नहीं जानते कि मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ, मेरे से उत्तम और कुछ नहीं है। मैं ही अविनाशी हूँ। मैं अपनी माया से प्रकट होता हूँ। इन इन्द्रियों से दूर सच्चिदानन्द परमात्मा को मनुष्य की भांति जन्माकर व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं।

हे अर्जुन – अतीत से पूरे औं वर्तमान में स्थित, भविष्य में होनेवाले सब भूतों को मैं जानता हूँ । परन्तु मेरे को कोई श्रद्धा भक्ति रहित नहीं जानता क्योंकि संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न हुए सुख-दुख इत्यादि मोह में डूबे हुए प्राणी अति अज्ञानता के अंधेरे में भटक रहे हैं । निष्पाप, श्रेष्ठ आचरण करने वाले लोग शान्त मन से दस माया जाल से निकलकर मोह मुक्त हो गए हैं। दृढ़ हृदय वाले व्यक्ति ही मुझे भजते हैं।

जो प्राणी मेरी शरण में आकर जीवन मृत्यु के बंधनों से छटना चाहते हैं, वे प्राणी ब्रह्मा को तथा सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं। जो प्राणी अधिभूत और अधिदेव के सहित अध्यात्म जानते हैं, यानि सबका आत्मारूप मेरे का जानते हैं। जैसे पृथ्वी सब जलरूप हैं, वैसे ही अधिदेव और विधि यज्ञ आदि सब कुछ वासुदेव स्वरूप है, जो ऐसा जानते हैं वे अन्तकाल में मुझे ही जानते हैं।


आठवाँ अध्याय (8th chapter of Bhagavad Gita online in Hindi)

Bhagavad Gita chapter 8 – Bhagwat Geeta adhyay 8 | गीता का आठवाँ अध्याय | गीता अध्याय 8

इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण जी के पवित्र मुख से ज्ञान की बातें सुनकर अर्जुन के चेहरे के भाव बदल रहे थे, अब पहले वाले भाव उसके मुँह पर नहीं थे । उसे जैसे-जैसे ज्ञान प्राप्त हो रहा था उसका हृदय परिवर्तन हो रहा था। तब अर्जुन बोला – हे मधुसूदन ! जिस पुरुषोत्तम का आपने वर्णन किया है, वह ब्रह्म क्या है ? अव्यक्त क्या है, कर्म क्या है और अधिभूत नाम से क्या कहा गया है ? अध यज्ञ कौन है और वह इस शरीर में कैसे हैं ? युक्म मन वाले प्राणियों द्वारा अन्त समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं।

अर्जुन के मुख से यह प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण हँसते हुए बोले – हे अर्जुन – परम अक्षर जो कभी नष्ट नहीं होता इसे ही आदि ब्रह्मा ईश्वर कहते हैं । परमात्मा ही ब्रह्मा है और अपना स्वरूप ज्ञानी जीवात्मा अध्यात्मक नाम से कहा जाता है तथा भतों के भाव को उत्पन्न करने वाला शास्त्र विहीन यज्ञ दान आदि निर्मित जो द्रव्यादियों का त्याग देता है वह कर्मनाम से कहा गया है । उत्पत्ति, विनाश, धर्मवाले सब पदार्थ अधिभूत हैं और हिरण्यम पुरुष आदि अधिदैव हैं। देहधारियों में सबसे श्रेष्ठ अर्जुन इस शरीर में वायुदेव ही विष्णु रूप से अधि यज्ञ हैं।

जो प्राणी अन्तकाल में मेरे को ही स्मरण करता है और मुझे याद करते हुए अपना शरीर त्याग देता है वही मेरे साक्षात् रूप को प्राप्त होता है, इसमें जरा भी संदेह नहीं है।

यह प्राणी अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग देता है उसको वही प्राप्त होता है । क्योंकि प्राणी सदा जिस भाव का चिन्तन करता है अन्तकाल में भी प्राय उसी का स्मरण होता है।

इसलिए हे अर्जुन – तुम हर समय निरनतर मेरा स्मरण करो और युद्ध भी करो । क्योंकि पाप के विरूद्ध लड़ना, अधर्मी का नाश करना, यह मेरा कर्त्तव्य है, अब इस कर्त्तव्य को मैं तुम्हें सौंप रहा हूँ। यदि तुम अधर्म का नाश करोगे तो इससे मेरा मन खुश होगा ।

यह नियम है कि ईश्वर ध्यान के अभ्यास रूप योग से मुक्त अन्य और किसी ओर न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिंतन करता हुआ पुरुष परम प्रकाश रूप दिव्य, पुरुष को अर्थ परमेश्वर को ही प्राप्त है। होता है । इससे जो पुरुष सर्वज्ञ अनादि सब प्राणियों के शुभ और अशुभ धर्मानुसार शासन करनेवाला सूक्ष्म से अति सूक्ष्म सबके धारण पोषण करने वाले अचिंत्य स्वरूप सूर्य से सदृश्य नित्य चेतन प्रकाश रूप इस संसार के स्वामी त्रिलोकीनाथ ईश्वर का स्मरण करता हुआ उस दिव्य स्वरूप परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।

हे अर्जुन – वेद जानने वाले विद्वान जिस ईश्वर को ओंकार नाम से याद करते हैं और आसक्ति रहित यत्नशील महात्माजन जिसमें प्रवेश करते हैं तथा जिस ईश्वर को चाहने वाले ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस परमपद को तुम्हारे समक्ष संक्षेप में कहूँगा । सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर अर्थात अपने मन को संसार के मोहजाल से हटाकर अपने-अपने पाणों को मस्तक में स्थापित करके योग धारण में खोया जो प्राणी ओ३म् जैसे अक्षर रूप ब्रह्मा को उच्चारण करता हुआ शरीर को ग देता है वह पुरुष परम गति प्राप्त करता है । वह जीवन मरण से मुक्त हो जाता है।

हे अर्जुन – जो पुरुष मेरे में अनन्तचित्त से स्थित हुआ सदा ही निरन्तर मेरे को याद करता है, मेरी पूजा करता है ऐसे भक्त के लिए तो मैं स्वयं हाजिर होता हूँ। मैं स्वयं उसकी इच्छाओं का ध्यान रखता हूँ।

परमसिद्धि को प्राप्त हुए महात्माजन मेरे को प्राप्त होकर फिर इस, दुख भरे संसार में पुनः जन्म नहीं लेते हैं।

क्योंकि ब्रह्मलोक से लेकर सब लोक पुनरावृत्ति स्वभाव वाले हैं यानि जिनको प्राप्त होकर पीछे संसार में आना पड़ता है परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! मेरे को पाकर उनका पुनर्जन्म नहीं होता है क्योंकि मैं कालातीत हूँ और यह सब ब्रह्मादिकों को पार करके अवधि वाले होने से अनित्य है।

प्रिय अर्जुन – ब्रह्माजी एक हैं, उनको हजार चौकड़ी युग तक अवधि वाला और रात्रि को भी हजार चौकड़ी युग तक अवधि वाले जो पुरुष तत्व से जानते हैं अर्थात् काल के अवधि वाला होने से ब्रह्मलोक भी अनित्य जानते हैं । वे योगी जड़ काल के तत्व को जानने वाले हैं । इसलिए वे यह भी जानते हैं कि सम्पूर्ण दृश्य मात्र भूतगण ब्रह्मलोक दिन के प्रवेश काल में अव्यक्त से अर्थात् ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर से उत्पन्न होते हैं और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेश काल में अव्यक्त नाम ब्रह्मा के शरीर में लय होते हैं।

वह ही यह भूतमुदायक उत्पन्न हो-होकर प्रकृति के वश में होकर रात्रि को प्रवेश काल लक्ष्य होता है और दिन के प्रवेश काल में फिर पैदा होता है ।

हे अर्जुन – इस प्रकार से ब्रह्मा भी शान्त हो जाता है परन्तु इस अव्यक्त से भी अति दूर दूसरा विलक्षण जो सनातन अव्यक्त भाव है वह सच्चिदानन्द पूर्णब्रह्मा परमात्मा सब भूतों को नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता जो वह अव्यक्त अक्षर ऐसे कहा गया उसकी अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्त भाव को पाकर प्राणी पीछे नहीं जाते वह मेरा परमधर्म है।

हे अर्जुन – जिस ईश्वर के अन्तर्गत सर्वभूत है, जिस ईश्वर से यह जगत परिपूर्ण हैं वह सनातन अव्यक्त परम पुरूष अनन्य भक्ति से प्राप्त होने योग्य है ।

प्रिय अर्जुन – जिस काल में शरीर त्याग कर गए हुए भोगीगण पीछे न जाने वाली गति को भी पा लेते हैं उस काल अर्थात् मार्ग के बारे में तुम्हें बताता हूँ।

उन्हीं प्रकार के मार्गों में से जिस मार्ग में ज्योतिर्मय, अग्निदेवता, दिन का देवता, शुक्ल पक्ष का देवता, उत्तरायण के छः महीनों वाला देवता है, उस मार्ग में मरे हुए ब्रह्मवेत्ता अर्थात् परमेश्वर की उपासना से परमेश्वर परोक्ष भाव से जानने वाले योगीजन उपरोक्त देवताओं के क्रम से ले गए ब्रह्मा को प्राप्त होते हैं ।

जिस मार्ग में रात्रि देवता है, कृष्ण पक्ष का देवता है और दक्षिणायन के छः मास का देवता है, उस उलझन भरे मार्ग में मरने वाला प्राणी सकाम कर्म योगी उपरोक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले गया। हुआ चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभकर्मों का फल भोगकर पीछे आता है।

क्योंकि संसार में दो प्रकार के पक्ष अर्थात् शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष यानिदेवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गये हैं । इसमें एक मार्ग के द्वारा गया हुआ आगे आने वाली परमगति को प्राप्त होता है और दूसरे मार्ग द्वारा गया हुआ पीछे आता है अर्थात् जन्म मृत्यु चक्र में फँस जाता है।

हे अर्जुन – इन दोनों मार्गों को तत्व से जानता हुआ कोई भी योगी मोहित नहीं होता है अर्थात् वह निष्काम भावना से साधना करता है। कामनाओं में नहीं फंसता ।

इस कारण हे अर्जुन – तुम हर काल में समस्त बुद्धि रूप योग से युक्त हो अर्थात् निरन्तर मेरी प्राप्ति के लिए साधना करने वाले हो क्योंकि योगी लोक रहस्य को तत्व से जानकर वेदों को पढ़ने में तथा यज्ञ, तप और दान आदि करने में जो पुण्य फल कहा है उस सब को निःसंदेह उल्लंघन कर जाता है और सनातन पद को प्राप्त करता है।


नौवाँ अध्याय (9th chapter of Bhagavad Gita online in Hindi)

Bhagavad Gita chapter 9 – Bhagwat Geeta adhyay 9 | गीता का नौवाँ अध्याय | गीता अध्याय 9

हे अर्जुन – अब मैं तुम्हें इस गोपनीय ज्ञान को रहस्य के साथ कहूँगा जिसको जानकर तुम इस दुखों से भरे संसार से मुक्त हो जाओगे।

यह ज्ञान सब विधाओं का राजा तथा गोपनियों का भी गोपनीय एवं अति पवित्र, उत्तम प्रत्यक्ष फल वाला और धर्मयक्त र करने का बड़ा सुगम और अविनाशी है ।

इस तत्व ज्ञान रूपी धर्म में श्रद्धाहीन पुरुष मेरे को प्राप्त न होकर मृत्युरूपी संसार चक्र में भ्रमण करता रहता है। मुझ सच्चिदानन्द संसार परमात्मा से यह जगत जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अन्तर्गत संकल्प के आधार स्थित है।

इसलिए वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ, और वे सब भूत मेरे में स्थित हैं किन्तु मेरी योगमाया के प्रभाव को देखकर भूतों का पालन पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाली क्या मेरी आत्मा वास्तव में इन मूर्तियों में स्थित नहीं है, क्योंकि आकाश में स्थित उत्पन्न हुई सर्वत्र विचरने वाली महान वायु सदा ही आकाश में स्थित है वैसे ही मेरे संकल्प द्वार उत्पत्ति वाले होने से सम्पूर्ण भूत मेरे में स्थित है।

हे अर्जुन – प्रलयकाल में सारे प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं और उनको मैं कल्प के आदि में फिर छोड़ देता हूँ । मैं अपनी प्रकृति का सहारा लेकर अपने कारण अधीन मानव जाति को नष्ट करके बार-बार बनाता हूँ।

हे अर्जुन – मैं इस सृष्टि के रचनाकर्म में आसक्त हूँ, मैं ही अध्यक्ष हूँ, मेरी इसी अध्यक्षता में ही प्रकृति चराचर प्राणी मात्र को बनाती है । इसी कारण इस संसार का परिवर्तन होता रहता है । मूढ़ मनुष्य मेरे सर्वभूत परमेश्वर परमभाव को नहीं जानते हैं । इसी से मैंने जो मनुष्य रूप धारण किया है, उसकी अवज्ञा करते हैं । यह मूढ़ मनुष्य इसलिए मेरा अनादर करते हैं । क्योंकि इनकी आशा फलवती नहीं होती । वह जो कुछ कर्मदान पुण्य आदि करते हैं सब निष्फल है ।

सांसारिक चिंताओं से इनका चित्त विक्षिप्त रहता है और वे राक्षसी तथा आसुरी प्रकृति का सहारा चाहते हैं जो केवल मोह को ही पैदा करते हैं।

प्रिय अर्जुन – देवी प्रकृति माँ का आसरा रखने वाले महात्माजन तो मुझे सब जीवों का आदिरूप अविनाशी जानकर सब ओर से चिंतामुक्त होकर दृढ़ निश्चय से मेरी ही उपासना करते हैं । मुझ पर ही विश्वास करके मुझे प्रणाम करते हैं । ऐसे करोड़ों प्राणी हैं जो मेरा ही नाम जपकर अपना जीवन सफल बनाते हैं।

हे कौन्तेय – मैं प्रकृति भी हूँ, पितरों का सुधा भी हूँ । अनादि औषध भी हूँ, मंत्र भी हूँ, हवन की सामग्री भी हूँ, हवन की आग भी मैं ही हूँ, हवन की आहुति भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत का पिता भी मैं ही हूँ और माँ भी मैं ही हूँ। मैं ही ओंकार हूँ। मैं ही चारों वेद हूँ।

मैं ही इस सारे जगत की गति हूँ। सबका स्वामी हूँ सम्पूर्ण कर्मों का साक्षी हूँ । सबका निवास मुझमे हैं । सबकी उत्पत्ति हूँ। सबकी शरण हूँ । सबका हितकारी हूँ। बीज रूप हूँ, अविनाशी हूँ ।

सूर्य रूप धारण किए हुए मैं ही विश्व को अग्नि देकर जीवित रखता हूँ। मैं , ही जल बरसाता हूँ। जीवन भी मैं और मृत्यु भी मैं हूँ । जो मानव मेरी पूजा करके स्वर्गलोक में जाने की आशा रखते हैं । वे पुण्य स्वरूप इन्द्र में पहुँचकर स्वर्ग में बसकर दिव्य भोगों का भोग करते हैं ।

अपने पुण्य क्षीण होने पर इस मानव संसार में जन्म लेते हैं, वेदोक्त यज्ञादि कर्मों के करने वाले अपनी कामना के कारण कभी स्वर्ग में फँस जाते हैं । कभी संसार में आते हैं । इस प्रकार वे आवागमन में फंसे रहते हैं।

जो भक्त मेरा ध्यान करते हैं, मेरी उपासना करे हैं उन नित्य योगियों को मैं इस संसार में धन, जप, पुत्र, पौत्रादि देकर उनकी रक्षा करता हूँ और फिर आवागमन से उन्हें मुक्त करता हूँ। हे पाण्डव वीर अन्य देवताओं के भक्त वर्ग जो उनमें श्रद्धा प्रकट करके उनकी उपासना करते हैं वह मेरी विधिहीन पूजा हैं । इससे वे भक्त मुक्ति को नहीं पाते । मैं ही सब यज्ञों का प्रभु हूँ.। जो मुझे प्रभु ईश्वर नहीं मानते हैं वे कभी आवागमन से नहीं छूटते हैं।

वताओं के पूजने वाले देवगति को प्राप्त होते हैं । पितरों को पजने वाले प्राणी पितरलोक जाते हैं। मृमकों को पूजने वाले प्राणी मत्यलोक में जाते हैं । मुझे पूजने वाले लोक परमानन्द स्वरूप अचल पद को पाते हैं। जो कोई श्रद्धा से मुझपर फूल चढ़कार मेरी उपासना करते है उनकी दी हुई वस्तु को मैं खुशी से स्वीकार करता हूँ।

हे अर्जुन – तुम जो कुछ करो मुझे अर्पण करो । ऐसा करने से तम कर्म बन्धन रूपी शुभ अशुभ फलों से बच जाओगे और संन्यास योग में भक्त हाकर भक्ति की शक्ति से मुझे आवश्य पाओगे।

मैं सम्पूर्ण प्राणियों में समानरूप से हूँ। न कोई मेरा शत्रु है और न कोई मेरा मित्र है । वह मुझमें हैं और मैं उसमें हूँ।

हे पार्थ – कोई कैसा भी पापात्मा क्यों न हो, वह किसी भी वर्ण का हो, यदि वह मेरा सहारा ले तो वह उत्तम गति को प्राप्त होता है। फिर पुण्यात्मा ब्राह्मण और भक्त राजर्षि, उनका तो कहना ही क्या है ? इसलिए हे अर्जुन ! जो ओ३म् नमोः भगवते वासुदेवायः का भजन स्मरण करता है तो वह मेरे में ऐसे घुलमिल जाता है जैसे पानी के साथ पानी मिल जाता है । इसके साथ ही ओ३म नमोः नारायण बोले।


दसवाँ अध्याय (10th chapter of Bhagavad Gita online in Hindi)

Bhagavad Gita chapter 10 – chapter 10 bhagavad gita | गीता का दसवाँअध्याय | गीता अध्याय 10 | Geeta adhyay 10

हे पार्थ – मैं तुम पर बहुत खुश हूँ। इसलिए मैं तुम्हारी भलाई के लिए कहता हूँ। मेरे जन्म को तीनों लोकों में न देवता जानते हैं और न ही मुनि क्योंकि मैं सम्पूर्ण देवताओं और ऋषियों का आदि हूँ। वे सब मुझसे ही पैदा हुआ हैं और जो मुझे अज अनादि और सम्पूर्ण लोकों का ईश्वर जानते हैं वे प्राणी पापों से छूट जाते हैं।

हे अर्जुन – बुद्धिज्ञान, अव्याकुलता, क्षमा, सत्य, सुख-दुख, उत्पत्ति, लय, भय और अभय, अहिंसा, ममता, धैर्य ये सब प्राणी के भाव अलग-अलग मुझसे ही होते हैं। वशिष्ठ आदि सप्तर्षि सनकादिक चारों मुनि तथा चौदह मनु यह सब मेरे मन से पैदा हुए हैं। इनसे यह सृष्टि उत्पन्न हुई है । वो पुरूष मेरी इस विभूति को तत्व से जातने हैं

वे निश्चय ही योग से मुक्त होते हैं।
मैं ही सबकी उत्पत्ति कारण हूँ।
मेरे ही द्वारा सबकी प्रवृत्ति होती है।

यह मानकर बुद्धिमान प्राणी मेरा प्रातः स्मरण करते हैं। अहर्निश मुझमें ही मन लगाए रखते हैं और अपने प्राणों को मुझमें ही अर्पण कर देते हैं । इसी प्रकार वे स्वयं आनन्द भोगते हैं।

इस प्रकार जो प्राणी निरन्तर मेरे ध्यान में मग्न रहते हैं, उनको मैं ऐसी बुद्धि देता हूँ कि वे मुझे पा लें। ऐसे प्राणियों पर अनुग्रह करने के लिए आत्मभाव में स्थित जो मैं हूँ सो प्रकाशमान दीपक से उनके अज्ञान से उत्पन्न हुए अन्धकार को नष्ट कर देता हूँ।

यह सुनकर अर्जुन ने कहा – हे प्रभु – आप ब्रह्मा हो, परमप्रिय हो, नित्य पुरुष हो, आदि देव हो।अजय हो, विभु हो, सम्पूर्ण ऋषि, देवर्षि नारद सहित, देवल, वेदव्यासस आदि आपको अज और विभु कहते हैं और आप भी ऐसा ही कहते हैं। हे भगवन.जो कुछ आप कहते हैं, जो कुछ यह मुनिवर कहते हैं उसे मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवान ! देवता और दानव आपकी उत्पत्ति के कारण को नहीं जातने हैं।

हे प्रभु – आपकी जो दिव्य विभूतियाँ है उनको मुझसे कहिए। मुझे भी यह बताने का कष्ट करें कि आपका निरंतर ध्यान करते हुए मैं आपको किस तरह से जान सकता हूँ। आप अपनी प्राप्ति का उपयोगेश्वर और विभूति विस्तार पूर्वक मुझे सुनायें।

अर्जुन के नम्रता भरे शब्द सुनकर श्रीकृष्ण बोले हे अर्जुन – मेरी जो दिव्य विभूतियाँ हैं उनमें से मुख्य-मुख्य तुम्हें सुनाता हूँ क्योंकि मेरी सम्पूर्ण विभूतियों को कोई नहीं जान सकता, उनका कोई अन्त नहीं हैं।

हे अर्जुन – सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में मैं बसता हूँ। मैं ही अन्तर्यामी हूँ । उनकी उत्पत्ति और नाश करने वाला भी मैं ही हूँ। बारह मास के सूर्यों में से पोष मास का विष्णु सूर्य मैं ही हूँ।

मैं प्रकाशमान वस्तुओं में सूर्य, पवनों में मारीच नाम का वायु हूँ, तारागणों में चन्द्रमा, वेदों में सामवदे, देवताओं में इन्द्र, इन्द्रियों में मन और प्राणियों में चेतना शक्ति मैं ही हूँ।

रुद्रों में शंकर, यक्ष राक्षसों में कुबेर, आठ वस्तुओं में अग्नि, पर्वतों में सुमेर, पुरोहितों में वृहस्पति, सेनापतियों में शिवजी का पुत्र स्वामी कार्तिकेय और सरोवरों में सागर, महर्षियों में भृगु, वाणी में एक अक्षर ‘ॐ’ यज्ञों में जप यज्ञ, स्थावर में हिमालय और सिद्धों में कपिल मुनि मैं ही हूँ।

घोड़ों में ऊच्चैया, हाथियों में ऐरावत, अस्त्रों में वज्र, गौओं में कामधेनु, उत्पन्न करने वालों में कामदेव, साँपों में वासुकि, नागों में शेष नाग, जलचरों में वरूण, पितरों में अर्यत्रा, शासन करने वालों में यम मैं ही हूँ। – दैत्यों में प्रह्लाद निगलने वालों में काल, पशुओं में सिंह, पक्षियों में गरूड़, मछलियों में मगर और नदियों में गंगा, सृष्टि का आदि मध्य अवसान मैं ही हूँ।

विद्याओं में अध्यात्मक और नदियों में सिद्धान्त, अक्षरों में अकार चारों और मुखवाला सबको उत्पन्न करने वाला, सबका जीवन, सबका पालन-पोषण करने वाला मैं ही हूँ।

स्त्रियों में कीर्ति, श्रीवाणी, नेघा, स्मृति, द्युती, शान्ति और क्षमा, सामवेद में मंत्रों, वृहत्साम, छन्दमासी में मार्ग शर्व और ऋतुओं में बसन्त मैं ही हूँ। कपट में जुआ, तेजस्विनी में तेज, विजयकर्ताओं में विजय, उद्योगियों में उद्यम और सत्यबल में सत्य मैं ही हूँ । यादवों में वासुदेव, पाण्डवों में धनंजय, मुनियों में व्यास, कवियों में शुकदेव मैं ही हूँ।

जीतने की इच्छा करने वालों के लिए नीति प्राप्त करने वाले उपयोगी तत्वज्ञानियों में ज्ञान मैं ही हूँ।

सम्पूर्ण प्राणियों को उत्पन्न करने का बीज भूत मैं ही हूँ । चराचर प्राणियों में ऐसा कोई भी नहीं जिसमें मैं नहीं हूँ। मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त कोई नहीं है, जिसमें मैं नहीं हूँ वह जीवित नहीं है, मैं सर्वव्यापी हूँ, यह सारा संसार मुझसे चल रहा है । मैंने ही सृष्टि की रचना की है और मैं ही एक दिन महाप्रलय लाकर इसका विनाश कर दूँगा।

फिर नई सृष्टि रचने का कार्य मैं ही करूँगा। मैं जानता हूँ इस संसार में ऐसे भी प्राणी पैदा होंगे जो अपने को मुझसे शक्तिशाली समझेंगे तभी मैं अवतार लेकर उनका सर्वनाश करूँगा । इन सब बातों को अलग-अलग जानकर तुम्हारा क्या भला होगा ? तुम इतना ही जान लो कि इस सम्पूर्ण जगत को मैं अपने एक अंग से धारण कर रखा है।


ग्यारहवा अध्याय (11th chapter of Bhagavad Gita online in Hindi)

Geeta ka 11 adhyay | Bhagavad Gita 11th chapter | गीता का ग्यारहवा अध्याय | Bhagwat Geeta ka 11 adhyay

भगवान की विभूतियों को सुनकर अर्जुन ने कहा – हे प्रभु – त्रिलोकी नाथ आपने मेरे ऊपर अनुग्रह करके जो ज्ञान मुझे दिया है। इससे मेरा सारा मोह दूर हो गया है। प्रभु मैंने प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय का वृत्तांत आपके मुँह से विस्तारपूर्वक सुना और आपका लक्ष्य महात्मय भी सुना।

अब आप मुझे ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज इन छ: गुणों से युक्त अपने रूप के दर्शन करा दीजिए। यदि आप समझते हैं कि मैं आपका रूप देख सकता हूँ तो योगेश्वर आप एक बार मुझे अपने अविनाशी रूप को दिखायें। यही मेरी इच्छा है।

अर्जुन की बात सुन भगवान कृष्ण बोले – हे अर्जुन – तुम मेरे सैकड़ों, हजारों रूपों को देख सकते हो। यह मेरे अनेक प्रकार के दिव्य रूप हैं । यह सब अनेक वर्ण और अनेक प्रकृतियों के हैं परन्तु मेरे शरीर में सूर्य, वसु, रुद्र, अश्विनी कुमार और मरुदगणों के देव और उन आश्चर्य युक्त बातों को देखोगे जो तुमने पहले कभी नहीं देखी हैं ।

मेरे इस शरीर में चराचर सारे विश्व को एक स्थान पर इकट्ठे देख सकते हो और भी जिन चीजों को तुम देखना चाहते हो वह सब देख लो। तुम अपने इन नेत्रों से मुझे नहीं देख सकते हो । इसलिए मैं तुम्हें दिव्य नेत्र प्रदान करता हूँ। जिनसे तुम मेरा विराट रूप देख सकोगे।

इतना कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सामने अपना विराट रूप प्रकट कर दिया । उसमें उनके मुख में विराट रूप एक के बाद एक दिव्यगोचर हो रहा था।

अर्जन ने उस दिव्य शरीर में एक ही स्थान पर अनेक प्रकार से स्थित सम्पूर्ण जगत को देखा।

इतना विराट रूप देखकर अर्जुन की आँखें बन्द होने लगीं । वह धरती पर गिरते-गिरते बचा।अपने दोनों हाथ जोड़कर वह श्रीकृष्ण जी के सामने खड़ा होकर कहने लगा – हे प्रभु – मैंने आपके शरीर में सम्पूर्ण जगत को देख लिया। वास्तव में ही आप सृष्टि कर्ता हैं। आप ही तीनों लोकों को अपने अन्दर समाये हुए हैं। आपके मन के अन्दर ही ब्रह्मा कमल पर आसन लगाए बैठे हैं।

हे वासुदेव – आपके शरीर के अन्दर सब एक स्थान पर मुझे अनेक भुजाएँ, अनेक उदर, अनेक मुख, नेत्र और अनन्त रूप दिखाई दे रहे हैं। आपका आदि मध्य नहीं दिखाई देता। मुझे ऐसा दिखाई देता है कि आप किरीट, गदा, चक्र धारण करते हैं, तेज पुंज हैं चारों ओर आपका तेज, अग्नि और सर्य के समान चारों ओर विद्यमान हैं। जिसे देखकर मेरी आँखें चकाचौंध हो गई हैं।

हे मधुसूदन – मुमुक्षजनों के जानने वाले आप ही हो, इस संसार का आधार आप ही हो, सनातन धर्म के अक्षर तथा बिदाश रहित भी आप ही हो । आप ही सनातन पुरुष हो। आपका मध्य, अन्त कुछ नहीं है। सूर्य, चन्द्रमा आपके नेत्र हैं। जलती हुई आग की भांति आपका मुख है। आपके इस विराट रूप का तेज देखकर लोग डरते हैं।

हे मधुसूदन – आकाश और धरती के बीच में जो रिक्त स्थान पड़ा है, इस सबमें आप अकेले व्याप्त हो रहे हैं।

हे प्रभु – देवतागण डर के मारे आपकी शरण आए हैं, कितने अचंभित होकर दूर से ही प्रणाम कर रहे हैं । महर्षियों और योगियों के समूह आपकी स्तुति कर रहे हैं।

हे मधुसूदन – आपके इस विराट रूप को देखकर तो समस्त देव डर गए हैं । मैं भी डर के मारे व्याकुल हो रहा हूँ। यह आपका शरीर इतना बड़ा है कि आकाश को स्पर्श करता है, बड़ा कान्तिमय है, अनेक वर्णों से युक्त है, इसमें बड़ा विस्तीर्ण सुख है, बड़े-बड़े नेत्र हैं, इसे देखकर डर लग रहा है । प्रभु, यह कैसा विराट रूप है जिसके आगे सारा संसार अपने आप झुक जाता है, आप महान ही नहीं विचित्र भी हैं।

हे प्रभु – यह मैं क्या देख रहा हूँ। धृतराष्ट्र के सारे पुत्र आपके मुँह में प्रवेश करते नजर आ रहे हैं, इनमें से तो कितने ही आपके दाँतों तले दबकर चूर्ण बन गए हैं । जैसे नदियों की अनेक शाखाएँ स्पगर की ओर ही दौड़ती है, वैसे ही यह तुम्हारी जाज्वल्यमान समख में प्रवेश कस्ते दिखाई देते हैं।

हे भगवन – जैसे अत्यन्त वेगवती नदी नाश के लिए बढ़ती जाती है वैसे ही बड़े लोग नाश के लिए आपके मुख में घुसे जा रहे हैं। हे कृष्ण ! अपने प्रज्जवलित मुखों में सम्पूर्ण लोकों को चारों ओर से चाटते हुए अपना ग्रास बना रहे हो और आपकी उग्रकांति सब जगह को अपने प्रकाश से परिपूर्ण करके तृप्त कर रही है।

हे प्रभु – आप ऐसे ही उग्र रूप वाले कौन हैं, मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ। मैं आपकी प्रवृत्ति नहीं जानता । इससे आदि पुरुष मैं आपको जानना चाहता हूँ । हे देव श्रेष्ठ, कृपा करके मुझ अपने रूप के बारे में बताइए, बस यही मेरी आपसे प्रार्थना है।

श्रीकृष्ण हसंकर बोले – हे भक्त अर्जुन – मैं इन लोकों का संहार करने के लिए प्रवृत हुआ हूँ।

वह बड़े-बड़े योद्धा जो सेना में खड़े हैं, जिन्हें तुम अपने संबंधी भाई, भतीजे, चाचा, ताऊ, गुरू कहते हो, यदि तुम इन्हें नहीं मारोंगे तो भी यह मरेंगे ही। इसलिए अर्जुन तुम तैयार हो जाओ । कमर कसकर खड़े हो जाओ और इन शत्रुओं का नाश करके अपनी वीरता को सिद्ध करो। वैसे तो इन सबको मैंने मार ही रखा है । तुम्हारा तो इनको मारने में नाम ही रखा गया है। तुम तो इसके निमित्त मात्र हो । तुम्हें दुखी होने की आवश्यकता नहीं है । तुम आगे बढ़ो, तुम अवश्य ही विजयी होगे।

संजय ने धृतराष्ट्र से कहा – हे राजन – कृष्णजी से ये सब बातें सुनकर अर्जुन काँपने लगा और बार-बार हाथ जोड़कर नमस्कार करने लगा । डर के मारे काँपते स्वर में अर्जुन बोला – हे प्रभु ! आपका प्रभाव अद्भुत है, कीर्ति अतुलनीय है। इसी कारण यह जगत हर्षित होता है, आपमें अनुराग रखता है । राक्षस डर के मारे भाग रहे हैं । सिद्ध पुरूष आपको नमस्कार कर रहे हैं । हे त्रिलोकीनाथ आपको सब प्राणी नमस्कार कर रहे हैं क्योंकि आप तो ब्रह्मा से भी बड़े आदि कर्ता हैं । आप सत्य के पुजारी, अविनाशी हैं, इसलिए आप सब प्राणियों के लिए नमस्कार करने योग्य हैं।

हे प्रभु ! आप आदि और पुरातन पुरूष हो, सम्पूर्ण विश्व के ज्ञाता हो, जो कुछ जानने योग्य वस्तु है वह आप ही हो । मुनियों के परमधर्म आप ही हो। यह सम्पूर्ण विश्व आपके अनंत रूप में व्याप्त वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, ब्रह्मा और ब्रह्मा के पितामह भी आप ही हैं । इसलिए आपको कोटि-कोटि प्रणाम।

हे परमेश्वर आपको चारों ओर से नमस्कार है । आप अनन्त वीर्य और अनन्त पराक्रम से युक्त हो, सबमें व्याप्त हो, इसी से आप सर्व हो, मैं आपको अपना स्नेही मानता हूँ। पहले मैं आपको केवल अपना मित्र मानता था किन्तु आज आपका विराट रूप देखकर आपकी महिमा को जान गया हूँ।

अब से पहले तो मैं एक मित्र के नाते आपसे मजाक भी कर लिया करता था । खाते-पीते, चलते-फिरते हम आपस में छेड़-छाड़ भी कर लिया करते थे । और लोगों की तरह हम दोनों भी सबके सामने एक दूसरे से हँसी-मजाक करके उलझ भी जाया करते थे।

आज मुझे लग रहा है कि यह मेरी भूल थी । मैं आपसे छेड़-छाड करके अपने को दोषी मानता हूँ। अब मैं आपसे क्षमा प्रार्थी हूँ। आज तो मेरी आँखों के आगे से जैसे परदा सा उठ गया है । आप ही माता. पिता एवं महान गुरू हैं। तीनों लोकों में आपके बराबर कोई नहीं है।

हे प्रभु – आप ही ईश्वर हैं, आप पूज्य हैं, मैं आपको साष्टांग दण्डवत करता हूँ। मुझ पर कृपा कीजिए । मेरे पिछले पापों को अनजान समझकर साफ कर दीजिए, जैसे कोई पिता अपने पुत्र की भूल को क्षमा कर देता है, मित्र मित्र की भूल को क्षमा कर देता है, पति-पति के अपराधों को सहन कर लेती है।

मैं आपसे एक बार फिर विनती करता हूँ कि मैंन जो पहले भूत की हैं उसका कारण केवल मेरी अज्ञानता अथवा आपका सम्पूण परिचय न होना था। आज मैं बहुत खुश हूँ कि मैंने आज ईश्वर के साक्षात् दर्शन कर लिये हैं । अब तो प्रभु आपके रूप को देखने की शक्ति मुझमें नहीं है। मेरी यही प्रार्थना है कि आप अपने पिछले रूप में ही वापस आ जाएँ । मेरे लिए तो आपका पहला रूप ही अच्छा है, उस रूप में आप मेरे अपने लगते हो।

हे अर्जुन – मेरा यह तेजमयी रूप अनन्त और आदि रूप है । इस रूप को तुम्हारे शिवा आज तक किसी ने नहीं देखा है। तुम पर खुश होकर मैंने आत्म योग से अपना विराट रूप दिखाया है। चारों वेदों के ज्ञाता, यज्ञ साधन, दान, अग्निहोत्री दान, अग्निहोत्रादि कर्म तथा उग्ररूप प्राप्त करे कोई मेरे इस रूप को देखना चाहे तो भी नहीं देख सकता । हे अर्जुन ! मेरे इस विशाल रूप को देखकर तुम व्यथित न हो, व्याकुल न हो, अपनी सूरत को देखो । निडर होकर खुशी मन होकर मेरे पहले रूप को फिर देखो।

संजय ने धृतराष्ट्र से कहा-हे कौरव राजा ।

श्रीकृष्ण भगवान ने फिर से अपना पुराना रूप धारण कर लिया और भयभीत अर्जुन को प्यार से कहा, हे वीर शिरोमणि ! अब तो तुम खुश हो।

हे कृष्ण – अब मेरा मन शान्त है । आपका यह शान्त मनुष्य रूप देखकर मेरा सारा डर जाता रहा, अब मेरे मन में कोई भी शंका नहीं। मेरी आत्मा के अंधेरे दूर हो गए हैं । आपके दिए ज्ञान से मेरे सारे अंधेरे दूर हो गए हैं।

हे अर्जुन – तुमने जो मेरा रूप देखा है, उस रूप को देखने के लिए देवता भी तरसते रहते हैं । एक बात याद रखो वीर अर्जुन जो कोई सच्चे मन से मुझे याद करता है, सच्चे मन से मेरी उपासना करता है वही मुझे प्राप्त कर सकता है । भक्ति में ही शक्ति हैं । मैं अपने भक्तों का पूरा ख्याल रखता हूँ।


बारहवाँ अध्याय (12th chapter of Bhagavad Gita online in Hindi)

Geeta ka 12 adhyay | Bhagavad Gita 12th chapter | गीता का बारहवाँ अध्याय | Bhagwat Geeta ka 12 adhyay

भगवान कृष्ण के विराट रूप को देखने के पश्चात उनके फिर से पुराने रूप को देख अर्जुन का मन शान्त हो गया । वह धैर्यपूर्वक कृष्ण जी से बोला – हे कृष्ण मुरारी – जो अनन्य प्रेमी भक्तजन इस पूर्वोक्त प्रकार से आपके भजन ध्यान में लगे हुए आपके सगुण रूप परमेश्वर की अति श्रेष्ठ भाव से उपासना करते हैं और जो अविनाशी, सच्चिदानन्द निराकार की ही उपासना करते हैं, उन दोनों प्रकार के भक्तों में अति उत्तम योग्य वेत्ता कौन है ?

अर्जुन के मुख से यह शब्द सुनकर श्रीकृष्ण बोले-हे अर्जुन ! जो अपने मन को एकाग्र करके निरन्तर मेरे भजन उपासना में लगे हुए. भक्तजन मेरे लिए अपने मन में श्रद्धा रखते हुए मुझे सगुण रूप परमेश्वर जपते हैं, वे मेरे को योगियों से भी उत्तम योगी मान्य हैं। वह मुझे सर्वाधिक प्यारे लगते हैं।

जो प्राणी इन्द्रियों को अच्छी तरह वश में करके मन-बुद्धि से परे सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एक रस रहने वाले नित्य अचल निराकार, अविनाशी ईश्वर, ब्रह्मा को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए उपासते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाव वाले योगी भी मेरे को ही प्राप्त होते हैं ।

किन्तु उस सच्चिदानन्द निरंकार ब्रह्मा में आसक्त हुए चित्तवाले प्राणियों के साधन में क्लेश यानि जब तक शरीर में अभिमान रहता है, तब तक शुद्ध सच्चिदानन्द निरंकार ब्रह्मा में स्थित होना कठिन है और मेरे परायण हुए भक्त सम्पूर्ण कर्मों को मेरे अर्पण करके मुझमें गुणरूप परमेश्वर को ही हर समय याद करते हैं, उपासना करते हैं. ऐसे भक्तजनों का मैं शीघ्र उद्धार करके उन्हें जीवन-मृत्यु के बन्धनों से मुक्त कर देता हूँ।

इसलिए हे अर्जुन – तुम मेरे में अपना मन लगाओ और मेरे ही बुद्धि को लगाओ । इसके पश्चात तुम मुझ में ही निवास करोगे अर्थात् मुझे पा लोगें, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है ।

यदि तुम मेरे में ही मन लगाओ और मेरे में ही बुद्धि को लगाने में स्थित हो तो अभ्यास रूप योग के द्वारा मेरे को प्राप्त होने की इच्छा करो।

यदि तुम इन अभ्यासों में असमर्थ हो तो केवल मेरे लिए कर्म करने की ही परायण, अर्थात् स्वार्थ को त्यागकर परमेश्वर को ही परम आश्रय और परम-गतिमय समझकर इस प्रकार मेरे कर्मों को करते हुए मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होंगे।।

यदि इसको भी करने में असफल रहे तो जीते हुए मन वाला और मेरी प्रोप्ति रूप योग के शरण होकर सब कर्मों के फल को मेरे लिए त्याग दो क्योंकि कर्म को न जानकर किए हुए अभ्यास से परोक्षज्ञान श्रेष्ठ है और परोक्षज्ञान से मुझ परमेश्वर के रूप का ध्यान श्रेष्ठ है। तथा ध्यान से भी सब कर्मों के फल का त्याग करना श्रेष्ठ है और त्याग से ही तत्काल मन को शान्ति मिलती है।

इस प्रकार शान्ति को प्राप्त करके जो पुरुष सब भूतों में द्वेष भाव से रहित स्वार्थ हित सबका प्रेमी और दयालु है, तथा ममता से रहित और अहंकार से दूर सुख-दूख की प्राप्ति में सम और क्षमादान है।

जो ध्यान योग से मुक्त हुआ निरन्तर लाभ हानि में सन्तुष्ट है तथा जो ध्यान योग में लगा हुआ निरन्तर लाभ-हानि में भी धैर्य रखता है। और मन वे इन्द्रियों को अपने वश में करके मुझपर पूर्ण विश्वास रखता है, मेरी उपासना करता है, ऐसा प्रेमी भक्त ही मुझे प्रिय है।

जो प्राणी उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है, तथा जो खुशी और दुख डर से रहित है, वह भक्त भी मेरे को प्रिय है।

जो प्राणी आकांक्षाओं से रहित तथा बाहर अन्दर से पवित्र और जिस काम के लिए आया था, वह काम पूरा कर चुका है, पक्षपात रहित और दुखों से बचा हुआ है वह त्यागी भक्त भी मुझे प्रिय है। जो कभी न खुश होता है और न रोता है, न किसी का बुरा करता है, न कामना करता है तथा अच्छे और बुरे दोनों कर्मों के फल को त्याग चुका है, वह भक्ति युक्त प्राणी मेरे को प्रिय है।

जो प्राणी शत्रु मित्र के मान-अपमान में सम है तथा सर्दी-गर्मी – सुख-दुख का अनुभव भी नहीं करता, अर्थात् इन सबमें एक-सा ही रहता है, मैं सदैव उसका शुभ चिन्तक हूँ।

जो मेरे परायण हुए अर्थात् मुझे परम आश्रम और परमगति एवं सबका आत्मरूप और सबसे दूर परमपूज्य समझकर सच्चे मन से इस अध्याय में कहे हुए धर्ममय, अमृतमय को सच्चे मन से सेवन करता है, वही भक्त मेरे को सदा प्रिय रहा है ।

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