Dr Zakir Hussain in Hindi | डॉ जाकिर हुसैन कि जीवनी in 2021

दोस्तों इस आर्टिकल में आज मै आपको Dr Zakir Hussain Biography in Hindi में बताने जा रहा हूँ आशा करता हूँ आपको यह आर्टिकल पढ़ के डॉ जाकिर हुसैन की जीवनी पता चल जाये।

डॉ जाकिर हुसैन | Dr Zakir Hussain

सारा भारत मेरा घर है और उसके लोग मेरे परिवार के लोग हैं।….हम तंगदिली व खुदगर्जी को मिटावेंगे और हम इसको पवित्र कर्त्तव्य समझकर करेंगे। हम अपने राष्ट्रीय जीवन में शांति के साथ धर्म का, कला-कौशल के साथ नैतिकता का, काम के साथ विवेक का, पश्चिम के साथ पूर्व का तथा बुद्ध के साथ सीगफ्रीड का मिलाप करेंगे। हम शाश्वत और सांसारिक, दक्षता और विवेक, विश्वास और अमल दोनों लक्ष्यों को ध्यान में रखेंगे।

ये विचार भारत के तीसरे राष्ट्रपति डा. जाकिर हुसैन ने राष्ट्रपति का कार्यभार ग्रहण करते समय प्रकट किये थे। Dr Zakir Hussain हमारे उन अग्रगण्य राष्ट्र नायकों में से थे जिन्होंने अपना सारा जीवन राष्ट्र के लिये समर्पित कर दिया था। धीर, गम्भीर एवं सरल व्यक्तित्व वाले इस महान् पुरुष का प्रमाण कर्मक्षेत्र शिक्षा का क्षेत्र था।

Short जीवनी

Date of Birth (जन्मतिथि)8 फरवरी, 1897
Birthplace (जन्मस्थान)हैदराबाद
Kiran Bedi Age (आयु) in 202072 years (वर्ष)
Zodiac Sign (राशि)Aquarius (कुंभ)
पिताप्रकाश लाल पेशावरिया (वस्त्र व्यवसायी)
माताप्रेम लता
भाई कोई नहीं
बहनशशि
रीता पेशावरिया (टेनिस खिलाड़ी, लेखक)
अनु (टेनिस खिलाड़ी)
राष्ट्रीयताIndian (भारतीय)
Hometownअमृतसर, पंजाब
Home Address (Currently)56, फर्स्ट फ्लोर, उदय पार्क, नई दिल्ली -110049
Height लम्बाई (लगभग)5 feet 3 inches
Weight वजन/भार (लगभग)55 Kg
Eye Colour (आँखों का रंग)Black (काला)

डा. जाकिर हुसैन का परिवार (Dr Zakir Hussain Family)

Dr Zakir Hussain का जन्म अत्यन्त धार्मिक अफरीदी पठान परिवार में हुआ था। यह परिवार 18वीं शताब्दी के प्रारम्भ में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले के कायमगंज कस्बे के निकट पितौरा नामक ग्राम में बस गया था। इस परिवार का पुश्तैनी पेशा सैनिक सेवा था। जाकिर हुसैन के पिता फिदाहुसैन ने इस परम्परा को तोड़ा और वकालत पढ़ने के बाद हैदराबाद में वकालत शुरू की। थोड़े ही समय में उन्होंने पर्याप्त ख्याति प्राप्त कर ली।

डा. जाकिर हुसैन का जन्म (Dr Zakir Hussain was born in)

8 फरवरी, 1897 को हैदराबाद में जाकिर हुसैन का जन्म हुआ। अपने पिता की सात संतानों उनका स्थान तीसरा था। 1906 में उनके पिता का निधन हो गया। उनका परिवार पितारा (फर्रुखाबाद) में आकर रहने लगा।

डा. जाकिर हुसैन की शिक्षा

प्रारम्भिक शिक्षा के पश्चात् जाकिर हुसैन ने इटावा के इस्लामिया स्कूल में प्रवेश लिया। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय मुस्लिम जनमत टर्की के साथ था। विद्यार्थी जाकिर हुसैन ने भी टर्की के लोगों की सहायता के लिये धन संग्रह अभियान में भाग लिया। 1911 में प्लेग के भयंकर प्रकोप ने उनकी माता को उनसे विलग कर दिया। उन्हें उनकी माता से अविचल दृढ़ता तथा कार्य करने की लगन विरासत में मिली थी। इटावा में शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् वे मुस्लिम एंग्लो ओरिएंटल कालेज, अलीगढ़ में अध्ययन करने हेतु गये। अच्छे वक्ता और विनम्र प्रकृति के होने के कारण वे कालेज में शीघ्र ही लोकप्रिय हो गये। 

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Dr Zakir Hussain Career

जामिया मीलिया इस्लामिया की स्थापना

1920 के असहयोग आंदोलन के दौरान जब महात्मा गांधी ने अलीगढ़ का दौरा किया और विद्यार्थियों की एक सभा में उनसे सरकारी शिक्षण संस्थाओं के बहिष्कार की अपील की तो जाकिर हुसैन पर उसका व्यापक प्रभाव पड़ा। 29 अक्टूबर, 1920 को अपने अनेक सहयोगियों के साथ उन्होंने कालेज का बहिष्कार किया और राष्ट्रीय संस्था जामिया मीलिया इस्लामिया की स्थापना की।

जामिया मीलिया इस्लामिया में दो वर्ष रहने के बाद 1922 में वे उच्च शिक्षा हेतु जर्मनी गये और बर्लिन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। जर्मनी निवास काल में वे योरोप की सामाजिक एवं बौद्धिक प्रगति से बहुत प्रभावित हुए। जर्मनी में अपने मित्रों तथा अध्यापकों की प्रेरणा से उनमें योरोपीय कला, साहित्य तथा संगीत के प्रति प्रेम तथा जीवन के प्रति बुद्धिवादी दृष्टिकोण उत्पन्न हुआ।

Head of जामिया मीलिया इस्लामिया

1925 में भारत वापस आने पर Dr Zakir Hussain ने जामिया मीलिया इस्लामिया की दयनीय स्थिति में सुधार करने का बीड़ा उठाया और हर सम्भव प्रयास किये। 29 वर्ष की अवस्था में वे उसके कुलपति बने। उनके कार्यकाल में जामिया मीलिया इस्लामिया में नयी शिक्षा-पद्धति लागू की गयी। जिसमें विद्यार्थियों को सामाजिक दृष्टिकोण अपनाने तथा अच्छा नागरिक बनाने के लिये भी शिक्षा देने की व्यवस्था थी। अधिकांश राष्ट्रीय नेताओं का सहयोग जामिया मीलिया इस्लामिया को प्राप्त था।

डा. जाकिर हुसैन की सेवायें इस संस्था के विकास में बहुत सहायक सिद्ध हुईं। 1937 में जब अनेक प्रान्तों में कांग्रेस मंत्रिमंडल बने तो महात्मा गांधी ने उनसे बुनियादी तालीम (प्रारम्भिक शिक्षा) अपनाने को कहा। महात्मा गांधी ने डा. जाकिर हुसैन को प्रारम्भिक शिक्षा की राष्ट्रीय समिति का अध्यक्ष बनने के लिये आमंत्रित किया। इस समिति को नयी शिक्षा योजना की रूपरेखा बनाना था। Dr Zakir Hussain ने इस कार्य को बड़ी कुशलता पूर्वक किया।

Dr Zakir Hussain अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उपकुलपति बने

देश स्वतंत्र होने के बाद मौलाना अबुलकलाम ने डॉ जाकिर हुसैन से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का उपकुलपति बनने का अनुरोध किया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 1948-56 के अपने उपकुलपति के कार्यकाल में उन्होंने इस विश्वविद्यालय की मनोवृत्ति को स्वतंत्र भारत के स्वस्थ वातावरण के अनुरूप ढालने में सफलता प्राप्त की।

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Dr Zakir Hussain in Politics

1952-53 में जवाहरलाल नेहरू उन्हें राजनीति में लाये। डा. जाकिर हुसैन साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में विशिष्ट कार्य करने वाले लोगों के लिये सुरक्षित स्थानों में से राज्यसभा के लिये मनोनीत हुए। 1956 तक वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उपकुलपति एवं राज्यसभा के सदस्य दोनों पदों पर कार्य करते रहे।

डॉ जाकिर हुसैन अवार्ड व सम्मान (Dr Zakir Hussain Awards)

1957 में वे बिहार के राज्यपाल नियुक्त किये गये। राज्यपाल पद के कार्यकाल की सफलतापूर्वक समाप्ति के पश्चात् 1962 में वे भारत के उपराष्ट्रपति पद हेतु निर्वाचित हुए। उसी वर्ष उन्हें राष्ट्र की महान सेवा के लिये देश के सर्वोच्च अलंकरण ‘भारत-रत्न‘ से विभूषित किया गया। उपराष्ट्रपति के कार्यकाल में उन्होंने अपनी विशिष्ट योग्यता का परिचय दिया। वे अफग़ानिस्तान, थाई देश, सिंगापुर, मलेशिया, अल्जीरिया, टर्की, ट्यूनिशिया, सऊदी अरब तथा ग्रीस की सदभावना यात्रा पर भी गये।

3rd President of India (भारत के तीसरे राष्ट्रपति)

9 मई, 1967 को Dr Zakir Hussain भारत के राष्ट्रपति (President) निर्वाचित हुए। भारत के सर्वोच्च उपद पर उनके निर्वाचन का देश-विदेश में स्वागत किया गया। भारतीय जनता ने इसे अपने देश धर्मनिरपेक्ष नीति की विजय तथा एक ऐसे व्यक्ति का सम्मान माना जो भारतीय संस्कृति के सर्वोत्तम तत्वों का प्रतीक था। राष्ट्रपति के कार्यकाल में डा. जाकिर हुसैन ने विभिन्न प्रकार से शिक्षा और संस्कृति की सेवा की। राष्ट्रपति कार्यकाल में उन्होंने रूस, कनाडा, हंगरी, नेपाल तथा यूगोस्लाविया आदि देशों की यात्रा की। राष्ट्रपति पद के भार एवं व्यस्तता के बाद भी वे लेखन तथा सामाजिक कार्यों में समान रूप से रुचि लेते रहे।

डा. जाकिर हुसैन का निधन (Dr Zakir Hussain death)

दुर्भाग्यवश वे अपना कार्यकाल न समाप्त कर सके और 3 मई, 1969 को हृदयगति रुक जाने से उनका निधन हो गया। उनका निधन भारत के लिये गहरा आघात था। सभी राजनेताओं ने उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की और उनकी देशभक्ति, मानवसेवा तथा धर्मनिरपेक्षता की प्रशंसा की। उनके निधन से भारत, त्रिनिदाद, संयुक्त अरब गणराज्य, सूडान, सीरिया तथा नेपाल में राष्ट्रीय शोक मनाया गया। 6 मई, 1969 को उनकी अंत्येष्टि में भाग लेने आये विदेशी नेताओं तथा प्रतिनिधियों ने शोक सभा में संवेदना प्रकट की।

Dr Zakir Hussain Knowledge

डा. जाकिर हुसैन उर्दू, अरबी तथा फारसी के विद्वान् थे। एक सच्चे साहित्यकार की तरह वे प्रचार से सदा दूर रहे और साहित्य साधना में अपने जीवन का बहुमूल्य समय लगाया। राजनीति पर आपकी पुस्तक ‘ईथिक्स एंड दि स्टेट’,तालिमी खुदबात‘ आपके भाषणों का संग्रह 1943 में तथा 1959 में ‘एजूकेशनल रिकन्शट्रक्शनस् इन इंडिया‘ आपके शिक्षा सम्बन्धी विचारों तथा गहन अध्ययन का प्रमाण है। अनुवाद के क्षेत्र में अपने एडविन कैनन की पुस्तक ‘ऐलीमेन्ट्री पोलेटिकल एकानामी’ प्लेटो की प्रसिद्ध पुस्तक ‘रिपब्लिक‘ तथा फ्रेडरिक की ‘नेशनल एकानामी‘ आदि का अनुवाद योग्यता पूर्वक किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने बच्चों के लिये मौलिक एवं शिक्षाप्रद कहानियां भी लिखीं।

डॉ जाकिर हुसैन की रचनाएँ (Dr Zakir Hussain Books)
द पूरी देत रेन अवे
केपेतिलिज्म
स्केल एंड मैथड्स ऑफ़  इकोनोमिकस
रिपब्लिक
शहीद की अम्मा
अँधा घोडा
ए फ्लावर सोंग
Blowing Hot, Blowing Cold
Little Chicken in a hurry
Fertility Control in Risk Society
Education and National Development
Agrarian Structure in British

डा. जाकिर हुसैन की सोच

डा. जाकिर हुसैन का रुझान मुख्यतः शिक्षा की ओर था, वे स्वयं कभी राजनीति में नहीं आते। उनका मत था कि ‘राजनीति की पथरीली भूमि से नये राष्ट्र का पौधा नहीं उग सकता। इसका जन्म शिक्षा और संस्कृति की उपजाऊ भूमि से ही हो सकता है। अपने को शिक्षक कहने में वे गर्व अनुभव करते थे। भारत में राजनीति और शिक्षा दोनों के महत्त्व को स्वीकार करते हुए वे शिक्षा को ही सर्वोपरि स्थान देते थे।

उनके अनुसार ‘राजनीति खासकर अपने देश में एक पहाड़ी नदी के समान है जो अचानक ही उफन पड़ती है और शीघ्र ही सूख जाती है, पर शिक्षा एक मैदानी नदी के समान है जो मंथर गति से आगे बढ़ती है और पहाड़ों के दिल को गलाकर बारहों मास बहती रहती है।

राजनीति राष्ट्रीय शक्ति को बढ़ाना चाहती है; शिक्षा सामाजिक आदर्शों को प्राप्त करना चाहती है और वह इसमें जल्दबाजी नहीं करती। शिक्षा आदर्शों की जननी है वह इन्हें सदा तरोताजा रखती है। राजनीति इसकी रक्षा करती है इसलिये शिक्षा मालिक है और राजनीति सेवक। राजनीति काम में तेजी चाहती है, शिक्षा को परिपक्वता की आवश्यकता होती है। शिक्षा ही हमारी महान् सांस्कृतिक परम्परा का सही मूल्यांकन कर सकती है। ‘शिक्षा वास्तव में हमारे लोकतंत्रीय जीवन की जान है।

Dr Zakir Hussain महान् शिक्षाशास्त्री होने के साथ ही नैतिकता और सिद्धान्तों के प्रबल समर्थक थे। उनका कहना था कि कोई भी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र नैतिक कानून के बाहर नहीं रह सकता और यदि वह ऐसा करेगा तो उसकी बरबादी निश्चित है। सभ्यता और संस्कृति तभी सार्थक होंगे जब व्यक्ति तथा राष्ट्र राजनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में नैतिकता बरतें। नैतिकता राजनैतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में किसी प्रकार के शोषण की इजाजत नहीं देती। नैतिक नियमों के अन्तर्गत कुछ व्यक्ति या वर्ग दूसरों पर आधिपत्य नहीं जमा सकते।

डा. जाकिर हुसैन की पसंद

Dr Zakir Hussain मानव सेवा, उदारता तथा देशभक्ति में महात्मा गांधी के सच्चे अनुयायी थे। वे जाति तथा धर्मगत भेदभावों से रहित सच्चे भारतीय थे। उनकी शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक सेवाओं से देश का बहुत हित हुआ। उनकी विनम्रता तथा आत्मत्याग की सभी वर्गों द्वारा प्रशंसा की जाती थी। वे सचमुच अजातशत्रु थे। पत्थरों के टुकड़े, फोसिल तथा पांडुलिपियों का संग्रह उन्हें बहुत भाता था। उनका स्नेह केवल मानव के लिये ही नहीं था, पशु-पक्षी भी उन्हें बहुत प्रिय लगते थे। राष्ट्रहित के लिये उनका समर्पित जीवन सदियों तक भारतवासियों के लिये प्रेरणा का विषय रहेगा।

तो दोस्तों आपको यह आर्टिकल Dr Zakir Hussain Biography in Hindi कैसा लगा कमेंट करके जरूर बताए। अगर आप किसी और के भी बारे में जानना चाहते तो जरूर कमेंट करे। हम उसपे एक अछि आर्टिकल जरूर पब्लिश करेंगे।

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