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जनसंख्या वृद्धि पर निबंध | Essay on Jansankhya Vriddhi in Hindi
विगत 50 वर्षों से भारत में बहुत तेजी से Jansankhya Vriddhi हो रही है। चीन को छोड़कर भारत की जनसंख्या विश्व के किसी भी देश से अधिक है यदि हम पूर्व सोवियत संघ अमेरिका ग्रेट ब्रिटेन स्वीडन आस्ट्रेलिया और घाना इन 6 देशों की कुल संख्या को जोड़ने तो भारत की जनसंख्या थोड़ी अधिक हिट होती है किंतु विचित्र विडंबना है कि यदि क्षेत्रफल का अवलोकन करें तो भारत का क्षेत्रफल अमेरिका के क्षेत्रफल का एक तिहाई ही होगा।
1921 के पश्चात तो जनसंख्या में वृद्धि ही है किंतु उसी दशक के दौरान मृत्यु दर अधिक हो जाने से जनसंख्या में कमी आ गई लेकिन तब से आर्थिक विकास और वैज्ञानिक साधनों के कारण मृत्यु दर पर रोक लगी और इस समय या दर घटकर 13 प्रति हजार रह गया है तथा वर्तमान में जन्म दर 34 प्रति हजार है जन्मदर और मृत्युदर के बीच की खाई ही जनसंख्या विस्फोट है। देश में मानव और जीवन निर्वाह संसाधनों के मध्य संतुलन निरंतर स्खालित होता जा रहा है।
भारत का क्षेत्रफल विश्व के कुल भूभाग का 2.4 प्रतिशत है जबकि जनसंख्या विश्व की कुल जनसंख्या का 15% है। Jansankhya Vriddhi का ही आर्थिक विकास पर प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि विकास का भी जनसंख्या पर प्रभाव पड़ता है किसी भी देश की जनसंख्या का वहां के आर्थिक विकास से गहरा संबंध है
जनसंख्या का ना केवल परिणाम आत्मक पहलू भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है कि देश की जनसंख्या का कितना भाग कार्यशील है और निर्भरता अनुपात कितना है कार्यशील लोगों में कितने लोग कार्य कुशल हैं इसका भी बहुत असर पड़ता है यदि जितनी जनसंख्या बढ़ती है और उस बढ़ती हुई जनसंख्या को रोजगार उपलब्ध होता है देश का उत्पादन बढ़ रहा हो तथा कोई भी व्यक्ति अनूप आदत नहीं है तो यह कोई जनसंख्या समस्या नहीं कही जा सकती लेकिन अपने देश की स्थिति तो प्रदीप उल्टी है।
देश में केवल 33 परसेंट लोग कार्यशील हैं और उनमें भी अधिकांश और कुशल कार्य करता है यहां उत्पादन करने वाले कम तथा उपयोग करने वाले अधिक लोग हैं पर अब जी भी ज्यादा हैं फल स्वरुप आर्थिक विकास के लिए जितना विनियोग किया जाता है उसका 65% जनसंख्या विनीयोग (Population Investment) अर्थात सम्प्रति जनसंख्या के जीवनस्तर को बनाए रखने में ही लग जाता है।
जनसंख्या वृद्धि के कारण – Jansankhya Vriddhi ke Karan
अतः आर्थिक विकास के लिए केवल 35% भाग ही बचता है जिससे विकास दर का नीचा होना स्वाभाविक है और जन वृद्धि का हमारी आर्थिक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। विस्मय कारी तथ्य है कि भारत की जनसंख्या बाढ़ क्यों नहीं थम रही है? अनेक कारण उत्तरदाई है। इनमें यहां के लोगों की गरीबी एवं उनके साथ अनिवार्य रूप से जुड़े कारक जैसे अशिक्षा, अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
आमतौर पर निर्धन लोगों के अधिक बच्चे होते हैं, गरीब लोगों का कोई निश्चित जीवन स्तर नहीं होता है। बौद्धिक स्तर नीचा होने के कारण निर्धन व्यक्ति के संतान सामाजिक और निजी व्यय को भली प्रकार समझ नहीं पाते। आम धारणा होती है कि ईश्वर ने यदि संतान दी है तो आहार देगा ही। विवाह, प्रजनन धार्मिक एवं सामाजिक बंधन माने गए हैं। विवाह प्रथा के व्यापक चलन के अतिरिक्त देश में अपेक्षाकृत छोटी आयु में ही विवाहित जीवन प्रारंभ हो जाता है। जनन क्षमता का अनियंत्रित रूप से उपयोग होता है।
इस कारण जन्मदर ऊंची है। औद्योगिकरण की कमी, बाल श्रम का उपयोग, संयुक्त परिवार प्रणाली तथा सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था का संतोषजनक ना होना आदि जन वृद्धि के मूल कारकों में है। साक्षरता और शिक्षा के स्तर का प्रभाव भी समाज पर पड़े बिना नहीं रहता है। आज जो शिक्षा की व्यवस्था है, वह दोषपूर्ण एवं अवैज्ञानिक है। यदि वर्तमान शिक्षा स्तर में तीव्र गति से वृद्धि लाई जाए तो निश्चितमेव जन-नियंत्रण में सहायता मिलेगी।
देश में आधे पुरुष और तीन चौथाई स्त्री अभी भी अशिक्षित हैं। कुल जनसंख्या में लगभग 66% लोग अभी भी अशिक्षित हैं, उच्च शिक्षा प्रतिशत के साथ-साथ जनसंख्या प्रतिशत भी घटा चला जाता है। ब्रिटेन, अमेरिका, रूस और पश्चिमी जर्मनी में शिक्षा का प्रतिशत लगभग 99% है यही कारण है कि वहां जनसंख्या वृद्धि का प्रतिशत 1% से भी नीचा है। भारत के केरल प्रांत में साक्षरता भारत के साक्षरता औसत की दुगनी है।
Jansankhya Vriddhi को रोकने के उपाय
यही कारण है कि जन वृद्धि दर यहां बहुत कम है। जन वृद्धि में यह हर्ष बिना जोर-जबर्दस्ती के लोगों की स्वेच्छा से है इसलिए जन वृद्धि की बाढ़ को थामने के लिए अधिक से अधिक लोगों को साक्षर करना होगा। सामंती व्यवस्था भी जनवृद्धि का मूल कारण है। पर्दा प्रथा होने के कारण भारतीय स्त्रियां घर में ही रहती है और उनका मुख्य व्यवसाय बच्चा उत्पन्न करना है। हालांकि अब कुछ स्त्रियां खेती कार्यों और नौकरी में भी लग गई है।
यदि वे खेतों पर, उद्योगों में तथा नौकरियों में लग जाए तो अधिक बच्चे के पालन पोषण के उत्तरदाई से स्वयं ही दूर भागने लगेगी। पश्चिमी देशों में स्त्रियों का आर्थिक क्रियाओं में भाग लेना वहां की कम जनसंख्या वृद्धि के लिए उत्तरदाई है। ना केवल सरकार को अपितु समाज सुधारक को तथा जन सामान्य को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए कि कम से कम 18 वर्ष की लड़की तथा 21 वर्ष से कम आयु के लड़के की शादी नहीं की जाए।
भारत की परिस्थितियों में जनसंख्या नीति को मुल्त: संतति निग्रह का रूप देना होगा। ताकि कम से कम समय के भीतर जन वृद्धि को यथासंभव कम किया जा सके। इसके लिए परिवार नियोजन के संबंध में सुनिश्चित कार्यक्रम निर्धारित करना होगा। और कारगर तौर से उसे अमल में लाना होगा। परिवार नियोजन के संबंध में देश भर के लोगों को समुचित जानकारी देनी होगी। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में जहां 80% लोग बसे हुए हैं।ध्यातव्य है कि जनसंख्या समस्या एवं परिवार कल्याण कार्यक्रम का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए।
दलीय भावना से ऊपर उठकर एक राष्ट्रीय अभियान के रूप में इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। विरोधी दलों को चाहिए कि अपने निहित स्वार्थ के लिए जनता को गुमराह ना करें। ऐसा करना राष्ट्र विरोधी कार्य होगा लोगों के सक्रिय सहयोग के अभाव में जनसंख्या कार्यक्रम को आसानी से नहीं चलाया जा सकता है।
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