2 Best Essay on Vigyapan in Hindi | विज्ञापन पर निबंध

हैल्लो दोस्तों कैसे है आप सब आपका बहुत स्वागत है इस ब्लॉग पर। हमने इस आर्टिकल में Vigyapan in Hindi पर 2 निबंध लिखे है जो कक्षा 5 से लेकर Higher Level के बच्चो के लिए लाभदायी होगा। आप इस ब्लॉग पर लिखे गए Essay को अपने Exams या परीक्षा में लिख सकते हैं

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Essay on Vigyapan in Hindi (400 Words)

विज्ञापन का अर्थ (Meaning of Vigyapan)

आज का युग विज्ञापन और प्रचार का युग है। जिसका प्रचार अच्छा होता है, वह वस्तु लोकप्रिय हो जाती है। वही उत्पाद बिकता है जिसका उत्पाद आकर्षक हो। आज जहाँ दृष्टि पड़ती है विज्ञापन-ही-विज्ञापन नज़र आते हैं। सुबह सोकर उठने से रात को सोने तक विज्ञापन की आवाजें हमारा पीछा करती रहती हैं। व्यापारी अपने उत्पाद को उपभोक्ता तक पहुँचाने के लिए विज्ञापन का आश्रय लेता है।

विज्ञापन से लाभ (Benefits of Vigyapan)

विज्ञापन शब्द ‘वि’ और ‘ज्ञापन’ से बना है। ‘वि’ का अर्थ हैविशेष और ‘ज्ञापन’ का अर्थ है- ज्ञान कराना। विज्ञापन एक कला है जिससे तैयार वस्तुओं की अधिक-से-अधिक जानकारी हो सके और लोगों में उसे खरीदने की इच्छा बढ़े। व्यापार के विकास में विज्ञापन बहुत सहायक हो रहे हैं। इससे उत्पादकों को पता चल जाता है कि उनके माँग की खपत कितनी हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियाँ तो वस्तु के बाजार में आने से पहले ही उसका विज्ञापन करना शुरू कर देती हैं। एक ही प्रकार की वस्तु जब अनेक कंपनियाँ बनाती हैं तो परस्पर प्रतियोगिता में माल बेचने के लिए सभी विज्ञापन का सहारा लेती हैं।

विज्ञापन से हानियाँ (Losses from advertising)

इससे कंपनी का नाम प्रसिद्ध होता है और उसके माल की ख्याति बढ़ती है। आज यह माना जाता है कि उत्पादक को लाभ पहुँचाना, उपभोक्ता को शिक्षित करना, विक्रेता की सहायता करना और उत्पादक और उपभोक्ता के बीच समन्वय का काम विज्ञापन ही करता है। इतना लाभ होने पर भी विज्ञापन की कुछ हानियाँ हैं। इन पर किया गया खर्च वस्तु के मूल्य में जोड़ा जाता है जिससे मूल्य में अनावश्यक वृद्धि हो जाती है।

निष्कर्ष

विज्ञापन से प्रभावित होकर मनुष्य कई बार अपनी चादर से अधिक पैर पसारता है और उसकी खून-पसीने की कमाई व्यर्थ चली जाती है। वह बचत नहीं कर पाता। कई कंपनियों के विज्ञापनों में ऐसे चित्र होते हैं जो युवा पीढ़ी का नैतिक पतन करने में सहायक होते हैं। सरकार और स्वयंसेवी संगठनों को इन पर रोक लगाने का प्रयत्न करना चाहिए।


Essay on Vigyapan in Hindi (600 Words)

प्रस्तावना

आज विज्ञापन ने प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है। विज्ञापन ऐसा मनोवैज्ञानिक प्रभाव है कि जिसके माध्यम से सामान्य भी महत्वपूर्ण प्रतीत होती है। विज्ञापनों के माध्यम से मनुष्यों की भावनाओं का शोषण किया जाता है। वस्तु के कवर बदल जाते है और वही वस्तु नई के नाम पर दाम बढाकर बेच दी जाती है। विज्ञापनों में लाखों खर्च किए जाते हैं। विज्ञापनों में आने वाले लोगों की चाँदी कटती है, उस चाँदी के मूल्यों को ग्राहक से वसूला जाता है।

विज्ञापनों में आने वाले अभिनेता, अभिनेत्री तथा अन्य लोग अपने हुनर और सौन्दर्य की कीमत वसुलते हैं। कम्पनियाँ ग्राहकों से। विज्ञापन दाताओं अपनी चंडी से स्वार्थ है। समाज के पतन से उनका कोई लेना देना नहीं है। विज्ञापनों के पीछे तर्क दिए जाते है की हम ग्राहको तक जानकारी भेजते हैं। यह सत्य है किन्तु विज्ञापनों के आदर्श क्या हैं, यह निर्धारित नहीं है।

विज्ञापन का प्रचलन और उसके प्रकार (Advertisement circulation and its types)

विज्ञापनों का प्रचलन जोर पकड़ता जा रहा है। अब हर प्रकार के कार्य के लिए विज्ञापन दिए जाने लगे हैं। विज्ञापन के माध्यम से मनुष्य सरलता से घर बैठे अपने कार्य को सगुम बना लेता है। कार्य के लिए कुछ ढूँढ़ना नहीं पड़ता है। विवाह के विज्ञापन, नौकरी के विज्ञापन, ज्यातिष के विज्ञापन। हर क्षेत्र में विज्ञापन । विज्ञापनों के माध्यम से धोखा घडी होने लगी। मनुष्य विज्ञापनों पर विश्वास कर खिंचा चला जाता है और ठगा जाता है। जितना बड़ा, रंगीन आकर्षक विज्ञापन उतना ही अधिक ग्राहक का विश्वास और विश्वास में धोखा।

अखवारों के पृष्ठों पर और समाचारों में ऐसी घटनाएँ प्रायः देखने को मिल जाती है जो विज्ञापन के कारण ठगे गए। विज्ञापनों के भेदों में अनेक सुविधाएँ तो हैं किन्तु ये विज्ञापन मनुष्य की विवशता का लाभ उठाने में खूब समर्थ है। अतः मनुष्य को सावधान होना चाहिए कि विज्ञापनों के चाक चौंध में आकर आँखें बन्द कर विश्वास नहीं करना चाहिए। उनसे प्रभावित नहीं होना चाहिए। जानकारी तक सीमित होना चाहिए और लोगों के अनुभव जानना चाहिए जो ठगे जा चुके हैं या लाभ उठा चुके हैं।

विज्ञापनों का भ्रमजाल और आश्चर्य (Confusion and surprise of advertisements)

वर्तमान में विज्ञापनों का क्षेत्र विस्तृत हो गया है विज्ञापन दाता वस्तु की अतिशयोक्ति पूर्ण व्याख्या करते हैं और सुयोग्य पुरुष भी उनके भ्रमजाल में फँसे बिना नहीं रहता है। इसके लिए विज्ञापन को आकर्षक बनाने के लिए नए-नए प्रभावित करने वाले दृश्य और स्लोगन दिए जाते हैं। आश्चर्य है इनके लिए कोई मापदण्ड नहीं है। जहाँ कृषक द्वारा उत्पादित वस्तु की कीमत सरकार निर्धारित करती है और कम्पनी द्वारा उत्पादित वस्तु की कीमत में विज्ञापन के खर्च भी जोड़ दिए जाते हैं।

कोई नियन्त्रण नहीं। दूसरा आश्चर्य है कि विज्ञापनों के जाल में फँसकर घरों में अनुपयोगी वस्तुओं को एकत्र कर लेता है। और कुछ दिनों बाद कूड़ेदान में फैंक दी जाती है। आश्चर्य है कि प्रसाधन के नाम पर स्नान घर में प्रसाधन वस्तुओं का ढेर लगा रहता है। घर के, किचन के, लैट्रिन के, बाथ-रूम के, घूमने के, कार्यालय जाने के नाम पर अनेक जूते-चप्पलों का ढेर लगा रहता है। यह विज्ञापनों की देन है। इस तरह कम्पनियों की कमाई होती है, उनकी बिक्री बढ़ती है।

विज्ञापन और सामाजिक दायित्व (Advertising and Social Responsibility)

विज्ञापन के दौर में विज्ञापन दाताओं को घिनौने, आकर्षक-भड़कीले विज्ञापनों से बचना चाहिए। उनका दूर गामी समाज पर प्रभाव पड़ता है। समाज में रहते हुए सामाजिक मर्यादाओं में रहकर ही विज्ञापन करने चाहिए। सरकार की दोहरी प्रकृति है कि एक और ऐसे विज्ञापन दिए जाते हैं जिससे बच्चों में दुष्प्रभाव पड़ता है और उनके गलत रास्ते पर चलने पर कानून उन्हें दण्ड देता है। सरकार को ऐसे विज्ञापनों पर रोक लगानी चाहिए। मनोवैज्ञानिक, समाज-शास्त्री-विज्ञजनो से चर्चाएं कर उनके दुष्प्रभाव पर विचार करना चाहिए और रोकना चाहिए, किन्तु ऐसा लगता है कि सरकार की भी उन कम्पनिया तक पहँचने की या रोकने के इच्छा शक्ति ही नहीं हैं।

इसलिए निर्भय होकर विज्ञापनों के माध्यम से जो समाज के सामने परोसते है वह समाज के लिए हितकर नहीं है। आज विज्ञापनों से जो लाभ की उम्मीदें थीं उनसे समाज को लाभ कम, हानि अधिक है। पेय द्रव्यों से होने वाली हानियों के बारे में समाचार-पत्रों से जानकारी मिली, फिर भी उन पर न रोक लगी और न कोई नियंत्रण। आग लगने पर कुंआ खोदने की प्रवृत्ति में कोई सुधार नहीं होता है। विज्ञापन अपना प्रभाव दिखाते हैं। न हमें कोई सुधारने का प्रयास करता है, अपने-आप तो सुधरने का प्रश्न ही नहीं उठता है।

उपसंहार

अतः विज्ञापन की अपनी अलग पहचान है विज्ञापन जनता के हित के लिए होते थे किन्तु आज उपभोक्ता की मानसिकता के शोषण का पर्याय बन गए। विज्ञापनों में कितनी सत्यता है, आज विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता है। अत: उपभोक्ताओं को विज्ञापनों से सावधान रहना अधिक श्रेयष्कर है। विज्ञापनों के चकाचौंध से चौधियाने पर ठगे जाने की अधिक सम्भवना हो गई हैं। विज्ञापनों का मूलभूत उद्देश्य तिरोहित हो गया है।



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