5 Best Chhote Bachcho Ki Kahani | बच्चों की कहानियां

Chhote Bachcho Ki Kahani के इस आर्टिकल में आप सभी का बहुत – बहुत स्वागत है। इस आर्टिकल में आपको छोटे बच्चो के लिए शिक्षाप्रद नैतिक कहानियाँ (Moral stories in Hindi) संग्रह मिलेगा।


नहले पे दहला – Chhote Bachcho Ki Kahani

किसी जंगल में एक ऊँट और एक गीदड़ पास-पास रहते थे। पास रहने में उनमें दोस्ती हो गई। वे दोनों साथ खाते, साथ खेलते और साथ ही घूमते-फिरते थे। कभी कोई किसी को अकेला न छोड़ता था।

एक साल वर्षा न होने के कारण जंगल में चारे की कमी हो गई। उस गीदड़ से मालूम हुआ कि नदी के उस पार का जंगल बड़ा हरा भरा है, वहाँ सभी खेत-अनाज और शाकभाजी से भरे पड़े हैं।

दूसरे गीदड़ की बात सुनकर वह गीदड़ बड़ा खुश हुआ ! उसने आकर ऊँट से कहा-‘नदी पार हरे-भरे खेत हैं, अगर चल सको तो वहाँ खूब पेट भर भोजन पा सकेंगे।

ऊँट बोला-‘यह कौन-सी बड़ी बात है ? तुम मेरी पीट पर सवार हो जाना, बड़ी आसानी से नदी पार हो चलेंगे। जरा रात हो जाने दो, रात हो जाने पर जब खेत वाले सो जायें, तब चलेंगे और खा-पीकर फिर लौट आयेंगे।

रात हो जाने पर दोनों दोस्त चले। ऊँट ने गीदड़ को अपनी पीठ पर बिठाकर नदी-पार कर दिया। वे दोनों एक मक्का के खेत में जा पहुँचे, उसी खेत में फूट भी थे, गीदड़ ने फूट-ककड़ी खाकर झट अपना पेट भर लिया, वह ऊँट से बोला-‘मुझे हूक आ रही है ।

ऊँट ने कहा-‘भाई, थोड़ी देर रुक जाओ। मैं बहुत भूखा था, मेरा पेट अभी नहीं भरा, पेट भर जाने दो।

ऊँट के कहने पर गीदड़ थोड़ी देर के लिए रुक गया, मगर वह अधिक न रुक सका, ऊँट अभी खा ही रहा था। कि गीदड़ हू-हू चिल्लाने लगा।

गीदड़ की चिल्लाहट सुनकर किसान जाग पड़ा, गीदड़ तो उसको आता देख झट भाग निकला, किसान ने ऊँट को डण्डे बरसाना शुरू कर दिया और मारकर भगा दिया। जब.ऊँट नदी पर पहुँचा तो गीदड़ से वह नाराज होकर बोला-‘तुमने मेरी बात न मानकर मेरा तो कचूमर ही निकलवा दिया, अब मैं तुम्हारे साथ कभी न आऊँगा।’

ऊँट की पीठ पर सवार होकर गीदड़ नदी पार अपने घर आ गया तो उसने ऊँट से खुशामद करके मना लिया। दूसरे दिन रात हो जाने पर वह फिर उसी खेत में जा पहुँचे।

गीदड़ का पेट भर गया तो पहले दिन की तरह फिर ऊँट से कहने लगा-‘मुझे हूक उठती है।’ । ऊँट के कहने पर थोड़ी देर तो वह रुका रहा, मगर फिर एक साथ चिल्ला उठा! किसान ने जागने पर तो ऊँट की खूब मरम्मत कर दी। वह भागकर नदी पर पहुँचा। – गीदड़ नदी पर पहले से ही पहुँच गया था। जाते ही ऊँट ने गीदड़ को अपने पीठ पर चढ़ा लिया। वह बीच धार में पहुँच गया तो बोला-‘भाई गीदड़, मुझे लुटलुटी आ रही है।

गीदड़ बहुतेरा रोया-चिल्लाया की नदी पार पहुँचकर ही लोटना, मगर ऊँट न माना। गीदड़ को लिए हुए वह नदी में लोट गया, पीठ के नीचे दबकर गीदड़ कीचड़ में में गड़ गया और थोड़ी देर में ही उसकी जान निकल गई।

इस बच्चों की कहानी से सिख : गीदड़ ने ऊँट के साथ जैसा किया था, वैसा ही उसे भी फल मिला।

5+ Best Moral stories in Hindi | नैतिक कहानियाँ

लालच बुरी बला है – बच्चों की कहानियां

एक मजदूर जब वृद्ध हो गया और मजदूरी करने की उसमें सामर्थ्य न रही, तो पेट भरने के लिए उसने कोई रोजगार करना चाहा। मजदूर गरीब तो था ही, रोजगार के लिए उसके पास रुपया कहाँ था? बगैर रुपये रोजगार कैसे हो सकता था?

खूब सोच-विचार के बाद एक-सौ रुपये कर्ज लेकर उसने कुछ मुर्गियाँ खरीद ली। मुर्गियाँ जो अण्डे देती, उन अण्डों को बेचकर वह अपने बाल-बच्चों का पालन करने लगा।

उन मुर्गियों में उसे एक ऐसी मुर्गी मिल गई, जो रोज एक सोने का अण्डा देती थी। मजदूर रोज सोने का अण्डा पाकर बड़ा खुश था। वह उस अण्डे को रोज बेच देता और बड़े आराम के साथ बाल-बच्चों को गुजर करता था।

एक दिन उसने सोचा, मुर्गी रोज सोने का एक ही अण्डा देती है, एक अण्डा को बेचकर मैं अपने बाल-बच्चों का पेट ही पाल सकता हूँ, उससे ज्यादा पैसा नहीं मिल सकता । अगर एक साथ अधिक सोने के अण्डे मिल जाये तो उन्हें पाकर मैं अमीर बन सकता हूँ।

ऐसा सोच-विचार कर वह ज्यादा अण्डे पाने के लिए उतावला हो गया, उसी उतावलेपन में उसने अधिक अण्डे पाने की गरज से उस मुर्गी का पेट चीर डाला। पेट चीरने पर ज्यादा अंडे मिलना तो दूर रहा, उसे.एक अंड भी-जो मुर्गी रोजाना देती थी-न मिला, बल्कि वह मुर्गी भी हाथ से जाती रहीं। . मुर्गी के मर जाने पर वह मजदूर बहुत दुःखी हुआ और अपनी समझ को कोसने लगा। वह मन में कहने लगा-‘यदि मैं लालच न करता तो मुर्गी क्यों मेरे हाथ से जाती?’

इस बच्चों की कहानी से सिख : ज्यादा लालच बुरी बला है।

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दुष्ट की संगति का फल – Bachcho Ki Kahani

बहुत दिनों पूर्व की बात है उज्जैनी के पास पीपल का एक बहुत बड़ा वृक्ष था। वृक्ष के ऊपर एक कौवा और एक हंस दोनों पड़ोसी की भाँति रहा करते थे। दोनों की प्रकृति में बड़ा अन्तर था। हंस तो अच्छे विचारों का था, किन्तु कौवा बड़ा दुष्ट था।

एक दिन दोपहर का समय था। सूर्य तप रहा था। एक शिकारी थका-मांदा पीपल के वृक्ष के नीचे पहुंचा। धनुष-बाण को बगल में रखकर उसकी ठंडी छाया में वह गहरी नींद सो गया। सोए हुए शिकारी के चेहरे पर पीपल के पत्तों से छन आती हुई सूर्य की धूप पड रही थी। हंस ने देखा तो उसके मन में दया आई। उसने सोचा कि शिकारी थका हुआ और गहरी नींद में है।

कहीं ऐसा न हो कि चेहरे पर धूप पड़ने के कारण उसकी नींद में बाधा आए। अतः उसने पीपल के उन पत्तों के बीच में अपना पंख फैला दिया जिनसे छनकर धूप शिकारी के चेहरे पर ना पड़े। कौवा हंस के इस सज्जनतापूर्ण कार्य को देखकर जल-भून गया। और उसने नीचे जाकर शिकारी के चेहरे पर बीट कर दी। इ

से शिकारी की नींद तो खुल ही गई, वह क्रोधित भी हो उठा। कौवा तो चेहरे पर बीट करके उड़कर दूसरे वृक्ष पर चला गया किन्तु हंस अपने स्थान पर ही विद्यमान था। उसे शिकारी से डरकर भागने की क्या आवश्यकता थी? उसने तो शिकारी कि प्रति अच्छा व्यवहार किया था और उसे सुख पहुँचाने का प्रयत्न किया था।

शिकारी ने क्रोधित होकर जब वृक्ष के ऊपर देखा तो उसे डाल पर बैठा हुआ हंस दिखाई पड़ा। उसने सोचा कि हो-न-हो इस हंस ने ही मेरे चेहरे पर बीट की है। उसने धनुष को उठाया और उस पर बाण चढ़ाकर हंस की ओर चला दिया। बाण हंस की छाती में जा धंसा और वह भूमि पर गिर पड़ा और छटपटा कर मर गया। हंस की मृत्यु दुष्ट प्रकृति के कौवे के साथ रहने के ही कारण हुई।

इस बच्चों की कहानी से सिख : जो लोग दुष्टों की संगत में रहते हैं वे हंस की भाँति अपने प्रणों से हाथ धोते हैं।

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Bachcho Ki Kahani

बहुत दिनों पहले की बात है, एक बार पक्षियों के राजा गरुड़ समुद्रतट पर घूमने के लिए गए। पक्षियों को जब यह बात पता चली तो वे झुंड-के-झुंड गरुड़ का – दर्शन करने के लिए समुद्र पर पहुँचने लगे। एक वृक्ष के ऊपर एक कोवा और एक बटेर दोनों साथ-साथ रहते थे। कौवे के कानों में जब गरूड़ के आगमन की खबर पड़ी तो वह भी उनके दर्शन के लिए चल पड़ा।

बटेर भी गरूर का दर्शन करना चाहता था, अतः वह भी कौवे के पीछे-पीछे चल पड़ा। कौवे को मार्ग में एक ग्वालिन दिखाई पड़ी। वह अपने सिर के ऊपर दही की मटकी रखे हुए थी। दही को देखकर कौवे के मुँह में पानी वह मटकी पर जा बैठा और उसके भीतर उतरकर चोंच से दही खाने लगा।

बटेर ने भी कौवे का अनुकरण किया। वह भी दही खाने के लिए मटकी के भीतर जा पहुँचा। ग्वालिन ने अपने घर पहुँचकर जब मटकी को नीचे उतारकर रखा तो कौवा उड़कर भाग गया। किन्तु बटेर भागा नहीं क्योंकि वह अपने को निरपराध समझता था । ग्वालिन के पकड़ में कौवा तो नहीं आया, किन्तु उसने बटेर को पकड़ लिया। उसने बटेर को गले को इतने जोर से दबाया कि बटेर के प्राण निकल गए।


जैसे को तैसा एक शेर बुड्ढा हो गया था, उसके पैर में शिकारी की गोली लग चुकी थी, चोट मामूली लगी थी, इस कारण घाव तो थोड़े ही दिनों में भर गया, मगर चोट के कारण वह लँगड़ा हो गया, जिससे वह चलने-फिरने में भी लाचार हो गया। दौड़ने-भागने में लाचार हो जाने से वह अब शिकार भी नहीं कर पाता था। बेचारा भूखे मरने लगा। वह भूख के कारण सूख-सूख कर काँटा हो गया।

शेर को दुःखी देखकर एक चालाक लोमड़ी उसके पास आई और उससे बोली-“महाराज! आप इस जंगल के राजा हैं। आपको आजकल दुःखी और दुबला देखकर मुझे बहुत दुःख है। मैं आपकी सेवा करना चाहती हूँ। मसीबत के समय अपने राजा की सहायता करना अपना धर्म समझकर ही मैं आपके पास आई हूँ।

अगर आप वायदा करें कि आप मुझे कभी नहीं मारेंगे, तो में सदा आपकी सेवा करती रहूँगी, आप शिकार को अपने पास आने पर, मार कर खा लिया करें। आपके खाने के बाद उस शिकार में से जो कुछ बचा रहा करेगा, मैं उसी से अपना पेट भी भर लिया करूंगी।

लोमड़ी की ऐसी प्रेम भरी बातें सुनकर शेर बहुत खुश हुआ। वह बोला-‘तुम मेरे बुढ़ापे और मेरी लाचारी पर तरस खाकर ही मेरी सहायता करना चाहती हो तो फिर मैं तुम्हारे साथ क्या कभी धोखा कर सकता हूँ? मैं तो तुम्हारे इस अहसान को सदा याद रखूगा और तुम्हारा प्रिय बनकर रहूँगा।

लोमड़ी शेर के वचन सुनकर बहुत खुश हुई और हर – रोज अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों में फंसाकर भोले जानवरों को शेर के पास लाने लगी। शेर जानवर को देखते ही उस पर टूट पड़ता और मारकर उसे खा जाता, बचा-खुचा माँस लोमड़ी खाकर अपना पेट भर लेती। इस प्रकार दूसरों की सहायता पाकर दोनों बहुत आनन्द के साथ अपना जीवन बिताने लगे।

इसी तरह कुछ दिन बीत जाने पर जानवरों को लोमड़ी की चालाकी मालूम हो गई। वे लोमड़ी से बहुत नाराज हुए। एक दिन जंगल के सब जानवरों ने पंचायत की, उसमें यह फैसला किया गया कि किस तरह लोमड़ी ने धोखा देकर हम जानवरों को सताया है, उसी तरह उसको भी शेर के हाथों मरवा डाला जाय । ऐसा करने से हमारा शेर से पीछा छूट जायगा और वह भी भूख से तड़प-तड़प कर मर जायेगा। अपने किये का फल पा जायेगा।

-यह फैसला हो जाने के बाद उन जानवरों में से कुछ पंच मिलकर उस शेर के पास गये और जाकर उससे कहा-‘यह जानकर कि आपके पैर में चोट आ गई है, हम लोगों को बड़ा दुख है। इस चोट के कारण आप चलने-फिरने से भी मजबूर हैं। इसलिए जब तक आपकी चोट ठीक नहीं हो जाती, हम लोग खुद ही आपके लिए एक जानवर हर रोज भेज दिया

करेंगे। साथ ही हम लोग इस चोट की दवा भी मालूम कर आये हैं। यदि किसी लोमड़ी का ताजा खून आप पैर से मलेंगे चोट बहुत जल्दी ठीक हो सकती है, इसलिए यदि हो सके तो आप इस इलाज को जरूर करें।’ यह कहकर जानवर चले गये।

थोड़ी देर बाद लोमड़ी शिकार फंसाकर शेर के पास ले आई। शेर ने शिकार छोड़ दिया-वह लोमड़ी पर टूट पड़ा और पकड़ कर उसे मार डाला। उसका खून अपने पैर से मला जो खून बच रहा-उसे वह पी गया।

इस तरह मरकर लोमड़ी ने अपने किये का फल पाया। उसके मारे जाने से बेचारे गरीब जानवरों की जान भी बच गई।


तो दोस्तों आप यह Chhote Bachcho Ki Kahani कैसा लगा। कमेंट करके जरूर बताये। अगर आप किसी अन्य कहानी को पढ़ना चाहते है जो इसमें नहीं तो वो भी बताये। हम उसे जल्द से जल्द अपलोड कर देंगे।

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