Hatim Tai and 6th Question full Story in Hindi | हातिमताई और छठाः सवाल

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Hatim Tai and 1st Question full Story in Hindi
| हातिमताई और पहला सवाल
Hatim Tai and 2nd Question full Story in Hindi | हातिमताई और दूसरा सवाल


Hatim Tai and 6th Question full Story in Hindi | हातिमताई और छठाः सवाल

जब हातिम शाहाबाद से पांच कोस दूर एक पत्थर की शिला पर बैठकर विचार कर रहा था, ईश्वर इतना बड़ा मोती कौन से समन्द्र से लाऊं । तो इतने ही में संध्या हुई तो क्या देखता है कि एक पेड़ पर दो पक्षी सतरंगे थे ।

हातिम को देखकर मादा बोली-यह सर नवाए कौन मनुष्य बैठा है। नर ने कहा-हे प्यारी यह यमन का शहजादा हातिम है। जल मुर्गी अण्डे के समान मोती की तलाश में जा रहा है। मादा ने पूछा-वह उस मोती का क्या करेगा ?

वह बोला-हे प्यारी, आज से तीस वर्ष पहले कहरम नदी के तट पर पक्षी मोती के समान अण्डे देते थे । उनमें एक मोती शाह के हाथ पड़ गया था। उस शाह के पास बड़ा भारी खजाना था । वह खजाना हुस्नबानू के हाथ पड़ गया । वह मोती भी उसी में था । मादा ने पूछा-अब उसके मेल का दूसरा मोती महापार सुलेमान के पास है । जो कि मनुष्य और परी से पैदा बरखज द्वीप का बादशाह है । उसकी एक पुत्री अति सुन्दर विवाह के योग्य है । परन्तु प्रतिज्ञा है कि जो कोई उस मोती की उत्पति बता देगा ।

उसी के साथ विवाह करूंगी और उसे ही इस मोती को दूंगा । उसके इस प्रतिज्ञा को सुनकर सैकड़ों परीजाद वहां पहुंचे परन्तु मोती की उत्पति कोई न बता सका और अपना मुंह लेकर अपने-अपने घर चले गए। उस मोती की उत्पति महापार सुलेमान चाहता था । वे सारे प्राचीन ग्रन्थ उसके हाथ पड़ गए जिसमें उस मोती की उत्पति लिखी है और उसी समय से उन पक्षियों को सुलेमान ने आज्ञा दी है।

किसी स्थान पर अण्डा न देना । इसी कारण से अब ऐसा मोती नही होता । परन्तु हम इसके सामने परोपकारी समझकर प्रकट कर दी और आशा है उसकी अभिलाशा जरूर पूरी होगी । मादा बोली-यह कहरम नदी तक कैसे पहुंचेगा ? क्योंकि यह प्रदेश तो देवों का है। – नर कहने लगा-हमारे लाल पंखों की राख पानी में घोल ले, और अपने शरीर पर उसका लेप कर ले तो जंगली जन्तु इसके पास न आवेगा और इसकी सूरत भी देवों की जैसी हो जाएगी ।

और जब यह बरखज द्वीप की सीमा में पहुंचे तो हमारे श्वेत पंख की राख को पानी में घोलकर शरीर पर लेप ले । फिर इसे यहां पर भी कोई व्याधा न व्यापेगी । स्नान करने पर वह ज्यों का त्यों हो जाएगा । तब नगर निवासी इसे महापार बादशाह के पास ले जावेगें । वह अवश्य ही मोती की उत्पति इससे पूछेगा । तब मैंने जैसे तुझे सुनाई यह वैसा कह दे ।

महापार सुलेमान इसे अपनी बेटी भी व्याह देगा और मोती भी दे देगा । क्योंकि वह भी अपने पंख एकदम फड़फड़ाए तो बहुत से पंख गिर पड़े जो हातिम ने उठाकर अपने झोले में रख लिए।

हातिम आगे चला तो क्या देखा कि एक सुन्दर जवान परीजाद नीचे को शीश करके हिचकियां भर रहा है । हातिम ने पूछा तो वह बोला- तू यहां किसलिए आया है ? तब हातिम ने कहा-मैं बरखज टापू के बादशाह के पास जा रहा हूं क्योंकि मुझे जलमुर्गी के अण्डे के समान का मोती चाहिए सो उसी के पास है । यह सुनते ही वह ठठा कर कहने लगाधन्य-धन्य, वह मोती तो मुझे मिल चुका ।

हातिम बोला-जो होगा देखा जाएगा, पहले तू अपने रोने का भेद बता । तब वह बोला-मैं तूफान टापू के बादशाह मगरूर का शहजादा हूं। मेरा नाम महराव है । मैंने उसी मोती वाले बादशाह की बेटी के स्वरूप की बडाई सनी तो बरखज टापू में जाकर उससे मिला और उसने मेरा बड़ा सम्मान किया। फिर वह मोती को दिखाकर कहा-यदि मेरी बेटी को तुम चाहते हो तो इसकी उत्पति बताओ और मोती समेत उसे ले जाओ । यह सुनकर मैं मौन रह गया।

बादशाह ने मुझे क्रोध में भरकर सभा से निकला दिया । जैसे तैसे यहां आ सका हूं । इसी स्थान में उसके बिरह में दिन-रात रोता रहता हूँ। तब हातिम बोला-देख ! मैं मोती की उत्पति जानता हूं, सो तू मेरे साथ चल । उस मोती को तो मैं लूंगा और तेरी प्यारी को तुझे दे दूंगा । उसे हातिम की बात पर विश्वास हो गया और उसके पीछे-पीछे चल दिया और दोनों महापार के नगर में पहुंचे और अपने आने की सूचना दी। महापार ने दोनों मित्रों को बुलाकर अपने पास बिठाया।

फिर महाराज ने पूछा-क्यों जी आप तो एक बार यहां होकर गए हैं । कहिए अब दूसरी बार आपके आने का क्या कारण है? महराव बोला-ये यमन के शहजादे हातिम हैं । सो हनको आपके दर्शनों की बड़ी इच्छा थी । मैं इन्हें साथ लेकर आया हूं। फिर बादशाह ने हातिम से पूछा-कहिए आप मिलने आए हैं या कोई और कारण है?

तब हातिम ने झोले से मोती निकाल कर दिखाया । मैं इसी के समान मोती की तलाश में आया हूं। सो कृपा करके आप मुझे प्रदान करे दे तो मेरी इच्छा पूर्ण हो जाए । इतनी सूनकर बादशह ने कहा-उस मोती का मिलना तो बड़ा कठिन है । क्योकि वह मोती और मेरी बेटी तो उसे मिलेगी जो इस मोती की उत्पति को बताएगा । हातिम बोला-मोती की उत्पति को अभी बता सकता हूं। परन्तु मुझे मोती ही चाहिए । बादशाह बोला-मैं अपनी बेटी को तुम्हें ही दूंगा।

क्योंकि यह मेरा प्रण है फिर आपकी राजी है, मेरी बेटी को चाहे जिसे दो । इतनी बात सुनते ही हातिम ने मोती की उत्पति का सारा हाल बताया जिसे सुनका महापार सुलेमान धन्य-धन्य कहने लगा और अपने अनुचरों को आज्ञा दी जाओ, शहजादी को सजाकर शीघ्र ही यहां ले आओ ।

जब शहजादी सभा में आ गई तब हातिम ने कहा-बादशाह, मेरी तो यह बहन के समान है। आप इसका ब्याह इस शहजादे के साथ कर दें और यह मोती मुझे दे दें। तब सलेमान ने बड़ी प्रसन्नता से शहजादी को महराव को सौंप दिया और वह मोती हातिम के हातिम के हाथ में दे दिया। फिर दोनों को महापार ने बड़े सत्कार के साथ विदा कर दिया ।

महापार ने परीजादों से कहा-हातिम को खटोले पर चढ़ा कर शाहाबाद पहुंचा दो । परीजादों ने तुरन्त हातिम को शाहाबाद पहुंचा दिया । हातिम ने परिजादों को तो लौटा दिया और बहुत खुश होता हुआ शहर में आया । उसे देख हुस्नबानू के नौकर हुस्नबानू के पास गए और इनका आगमन अपनी स्वामिनी को जा सुनाया ।

उसने आज्ञा दी कि मेरे पास ले जाओ । ऐसे कहकर आप परदे में बैठ गई और नौकरों ने हातिम को बाहर कुर्सी पर बिठाया । तब हुस्नबानू पूछने लगी- आप जलमुर्गी के अण्डे के बराबर की मोती ले आए? हातिम ने वह मोती परदे के भीतरडाल दिया जिसे देखकर बड़ी ही प्रसन्न हो सैकड़ों वार हातिम को धन्यवाद देने लगी।

फिर हातिम ने हुस्नबानू से कहा-अब तू अपना सातवा सवाल मुझे बता । ईश्वर की दया से उसका भी जवाब ला दूंगा । हुस्नबानू ने कहा-हमामबाद गिर्द की खबर ला दे, कि वह चक्कर लेता है तो लोग उसमें कैसे नहाते हैं ।

इतना पता और बताए देती हूं कि दक्षिण-पश्चिम के बीच नैशृत्य दिशा में है । अब हातिम सराय में आकर मुनीरशामी से मिला और कुछ दिन रहकर सातवें सवाल की खोज में चला।


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