Best Explained अयोध्याकांड रामायण कथा | Ayodhya Kand Ramayan in Hindi

इस लेख में हम आपको रामायण के दूसरे भाग अयोध्याकांडAyodhya Kand की सम्पूर्ण कहानी के बारें में विस्तार से लिखा है,

Ramayan in Hindi में 7 अलग-अलग तरह के कांड हैं जो कि इस प्रकार है –

  1. बालकांड – Balakanda
  2. अयोध्याकांड – Ayodhya Kanda
  3. अरण्यकांड – Aranya Kanda
  4. किष्किन्धा कांड – Kishkinda Kanda
  5. सुंदर कांड – Sundara Kanda
  6. लंका कांड – Lanka Kand
  7. लवकुश कांड – Luv Kush Kanda

इस महाकाव्य के अयोध्याकांडAyodhya Kand में 119 सर्ग हैं और इस सर्ग में 4 हजार 2 सौ 86 श्लोकों का वर्णन किया गया है। पुत्र जन्म, विवाह और गुरुदर्शन के लिए इस कांड का पाठ करना चाहिए।


अयोध्याकांड रामायण कथा | Ayodhya Kand Ramayan in Hindi

राम को युवराज बनाने का निर्णय और कैकयी के दो वरदान

चारों भाईयों की शादियां करके राजा दशरथ बहुत प्रसन्न हुए भरत और शत्रुघ्न शुरु से ही नाना के यहां रहते थे। क्योंकि उनके नाना की यही इच्छा थी कि वे दोनों उनके पास रहे इसलिए शादी के कुछ दिन पश्चात ही वे फिर अपने ननिहाल चले गए।

दशरथ की आयु के साथ-साथ ही उनकी काम करने की शक्ति पहले से कम होती जा रही थी। इसलिए उन्होंने अपने ऊपर से कामकाज का बोझ कम करने के लिए राम को युवराज बनाने का निर्णय किया।

वैसे भी अयोध्या निवासी राम से बहुत प्यार करते थे। उन सबकी भी इच्छा थी कि राम ही उनके राजा बनें । मंत्रीगण भी यही चाहते थे । इस शुभ काम की घोषणा राज-दरबार में कर दी गई राजा दशरथ श्रीराम को देश का सारा कार्य सौंपने वाले हैं |

राम का अभिषेक के लिए राज-दरबार की एक महासभा बुलाई गई। इसमें राम को आमंत्रित किया गया और उसी सभा में राजा दशरथ ने श्रीराम से कहा । देखो बेटे! अब मैं बूढ़ा हो चला हूं। मेरी और प्रजा की यही इच्छा है कि तुम ही राज्य का सारा कामकाज देखो तुम ही धर्म के पालन करते हुए रघुवंश की इज्जत रखोगे।

मैं केवल आपकी आज्ञा का पालन करना ही जानता हूं । पिताजी जो भी आज्ञा आप देंगे उसे जान देकर भी पूरा करना मेरा धर्म होगा।

शाबास, बेटे संसार में तुम्हारे जैसा सन्तान भगवान हर एक को दे। आज मेरे मन का सारा बोझ हल्का हो गया है। अब तो मैं तुम्हारा राजतिलक करके ही सुख पाऊंगा। यह कहकर दशरथ महलों की ओर चले गए।

राम भी उनके पीछे-पीछे माता कौशल्या के पास गए और पिता की राजतिलक वाली सारी बातें उन्हें सुना दी। मां अपने बेटे के मुंह से राजगद्दी पर बैठने की बात सुनकर बहुत खुश हुई । और फिर राम को अपने सीने से लगाकर समझाने लगी । बेटा, राजगद्दी पर बैठकर प्रजा और देश का ख्याल रखना, धर्म का कड़ाई से पालन करना ।

एक ओर राजमहलों में राम के राजगद्दी पर बैठने की तैयारियां हो रही थी तो दूसरी ओर कैकेयी की एक मुंहलगी दासी कुबड़ी मंथरा ने जैसी ही यह सूचना सुनी तो वह भागी-भागी कैकेयी के पास आकर बोली।

हे महारानी कैकेयी, तुम यहां पर चैन की नींद सो रही हो उधर मौत आपके सर पर मंडरा रहा है। क्या हुआ मंथरा, तुम यह कैसी बातें कर रही हो।

रानी जी इतना भोली न बनो क्योंकि आपको यह न पता हो कि राम का राजतिलक किया जा रहा है।

मंथरा यह तो खुशी की बात है राम ही तो बड़े बेटे हैं हमारे। उसे ही राजगद्दी पर बैठने का अधिकार है, मेरे लिए राम और भरत में अन्तर ही क्या है।

तुम पगली हो, नासमझ हो, क्यों तुम्हें यह भी नहीं पता कि राम के राजा बनते ही, कौशल्या महारानी बनेगी, वह तुमसे अपने पुराने बदले चुकाएगी । और यह राम जैसे ही राजा बनेगा। तुम्हारे बेटे भरत को अयोध्या से ही बाहर निकाल देगा नहीं तो उसे मरवा डालेगा।

यह तुम क्या कह रही हो मंथरा ?’

वही जो सत्य है, तुमने तो सत्य को देखकर आंखें बन्द कर ली हैं । मैं तो तुम्हारी डोली के साथ इसलिए आई कि तुम्हारे हर दुःख सुख का ख्याल रखू ।

मंथरा तुम्हारी बात को यदि मैं मान भी लूं तो भी मेरे पास इसका क्या उपाय है कि मैं राम को राजा बनाने से रोक सकूँ। कैकेयी तुम राजा दशरथ की सबसे प्रिय नारी हो । तुम्हें शायद याद नहीं कि, शम्बासुर के साथ युद्ध करते समय जब तुम महाराज के रथ में थी। उस समय महाराज के रथ का पहिया टूट गया था । तुमने अपनी शक्ति से राजा का रथ संभाला था। इसी बात से खुश होकर राजा ने तुम्हें दो मुंह मांगे वचन मांगने के लिए कहा था।

हां कहा था, किन्तु मैंने कहा था कि यह दो वचन मैं फिर कभी समय आने पर मांग लूंगी।

वह समय आ गया है कैकेयी । मैं क्या मांगू उनसे ?

यही कि पहला वचन भरत को अयोध्या का राजतिलक ! दूसरा वचन राम को चौदह वर्ष का वनवास ।

मंथरा की बात कैकेयी के मन को लग गई । अपने बेटे को राजा बनाने का सपना वह देखने लगी । इससे अच्छा अवसर उसके जीवन में फिर कब आएगा।

अयोध्या के राज पर अपना ही अधिकार हो जाएगा । यही सोचकर कैकेयी शोक महल में जाकर लेट गई जैसे ही राजा दशरथ महलों में आए तो कैकेयी को शोक महल में लेटे देखकर बहुत चिन्तित होकर कैकेयी के पास जाकर पूछने लगे।

‘क्यों महारानी आज यह उदासी कैसी ?’ ‘अब मेरे पास इस उदासी के सिवा और रह ही क्या गया

‘नहीं, ऐसे अशुभ वचन राजा दशरथ के होते हुए न ही बोलो मैं तुम्हारे लिए संसार की हर खुशी ला सकता हूं?’

‘महाराज, मुझे केवल थोड़ी-सी खुशी चाहिए, बोलो दे सकते हो?’

‘क्यों नहीं कैकेयी, क्या तुम्हें रघुवंशी दशरथ, पर विश्वास नहीं?’

‘विश्वास तो है, किन्तु फिर भी डरती हूं कि शायद आप उस युद्ध में दिए दो वचन कहीं भूल भी न गए हों ?’

‘कैकेयी, हम अपने प्राण बचाने वाली देवी को कभी भूल पायेंगे तुमने तो औरत होते हुए पुरुषों से बड़ा काम किया था, अब बोलो, तुम्हें क्या चाहिए?

“महाराज! मेरा पहला वचन तो यह है कि राम के स्थान पर अयोध्या का राज्य भरत को दिया जाए।’

‘दूसरा वचन यह है कि राम को चौदह वर्ष का वनवास दिया जाए।’

‘कैकेयी, यह तुम क्या कह रही हो, राम को वनवास’ नहीं नहीं…यह कहते दशरथ धरती पर गिर पड़े।’

‘क्यों महाराज, बस मुकर गए न बड़े रघुवंशी बने फिरते थे आप ।’

नहीं नहीं कैकेयी पूरी कर देता हूं, मैं तुम्हारे वचन तो अभी पूरा कर देता हूं, अभी भरत को ननिहाल से बुला कर उसे राजतिलक कर देता हूं, किन्तु तुम राम को वनवास भेजने की बात वापस ले लो। राम के बिना तो अयोध्या सूनी है, यह महल सूने हो जायेंगे, कौशल्या क्या कहेगी और मैं तो एक पल भी राम के बिना नहीं रह सकता।’

‘महाराज! आपको मेरे यह वचन तो पूरे करने होंगे, मैं केवल अपना अधिकार ही तो मांग रही हूं, बस इससे अधिक मुझे किसी चीज की भी आवश्यकता नहीं।’

‘कैकेयी! क्या राम तुम्हारा पुत्र नहीं है ? उस बालक पर दया करो। उसे वन न भेजो, मैं तुमसे इतनी ही प्रार्थना करता हूं । दशरथ की आंखों में आंसू निकलकर दाढ़ी पर चमकने लगे थे, परन्तु कैकेयी तो प्रतीत हो गई थी, उसने दशरथ की एक न सुनी।

‘दशरथ तो वचनबद्ध थे ।’

सारे महलों में खुशी का स्थान उदासी ने ले लिया राजा रात भर बेहोश पड़े रहे।

सुबह होते ही सारे महलों में हाहाकार मच गया, वैद्यराज ने राजा को होश में तो ला दिया, किन्तु उनकी जवान पर एक ही शब्द बार-बार आ रहा था।

“राम-राम, मेरे राम । जब राम अपने पिता के पास पहुंचे तो उनकी यह हालत देखकर उनकी आंखों में भी आंसू आ गए, वह रोते हुए अपने पिता के सीने से लग गए और दुःख के कारण पूछने लगे।’

राजा अपने दुःख के कारण बताने में असमर्थ थे किन्तु कैकेयी ने सारी बातें राम को बता दी।

राम हंसते हुए अपने पिता से बोले ।

आप इस जरा-सी बात के लिए चिंतित हो रहे हैं, मैं आपका पुत्र राम हूं, आप यदि मुझे आज्ञा दें कि मुझे मरना है तो मैं अपने हाथों से अपना सिर काटकर आपके सामने भेंट कर दूंगा, यहां तो केवल चौदह वर्ष का वनवास ही है, यूं ही हंसते-हंसते गुजर जाएगा, फिर इस राजमहलों में घुटन है, जंगल में आजादी होती है, आजादी बस आप आशीर्वाद दीजिए पिताजी।’

राम ने अपना निर्णय सुना दिया, अपने पिता के दिए वचनों की लाज रखने के लिए सब कुछ त्याग देने का फैसला कर लिया, तो उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण ने भी उनके साथ वनों में जाने का अपना निर्णय कह सुनाया।

माँ कौशल्या और सुमित्रा ने जैसे अपने बेटों के वन जाने की बात सुनी तो अपनी छाती पीट कर रह गई। इस कैकेयी के कारण उनका बसा हुआ संसार उजड़ रहा था। राजा स्वयं अपनी संतान से जुदा होने के गम में रो-रोकर पागल हो रहे थे।

राम, लक्ष्मण, सीता।

तीनों ने शाही वस्त्र उतार कर साधुओं वाले वस्त्र पहन लिए, सब कुछ त्यागकर पिता की आज्ञा का पालन करते हुए राम वनों को जाने लगे । सारा देश उनके जाने की खबरें सनते ही रो पड़ा था। प्रजा तड़प रही थी, सबके सब रानी कैकेयी को बुरा-भला कह रहे थे।

राम-लक्ष्मण, सीता तीनों ही साधुओं वाले वस्त्र पहनकर जंगलों में जा रहे थे । सारे अयोध्यावासी रोते-बिलखते तड़पते उनके पीछे चल रहे थे, राजा दशरथ की हालत तो इतनी खराब थी कि वे कभी होश में आते तो, कभी राम, राम कहते हुए बेहोश हो जाते । – रानी कौशल्या और सुमित्रा, उनकी देखभाल भी कर रही थीं, और रो भी रही थी, एक सुहाग का खतरा था, तो दूसरी ओर संतान से जुदा होने का दुःख।

रामचन्द्र जी का रथ घने जंगलों की ओर चला गया था । कौशल राज्य की सीमा पार करते ही राम, लक्ष्मण, सीता रथ पर से उतर गए ! अपने देशवासियों से विदा लेते हुए श्रीराम ने उन्हें सलाह दी कि अब आप लोग अपने-अपने घरों को वापस जाओ, जैसे मैंने अपने पिता की आज्ञा पालन किया है। अब तुम मेरी आज्ञा का पालन करो अपने-अपने घरों में जाकर राज्य की भलाई के लिए काम करो, मैं यह अमानत तुम्ही लोगों को देकर जा रहा हूं।

‘राम राम राम… हम तुम्हारे बिना कैसे रहेंगे।’

चौदह वर्ष की बात है, बस यूं ही बीत जायेंगी तुम मेरी प्रतीक्षा करना, मैं अवश्य आऊंगा।

सारे अयोध्यावासी रोते-पीटते वापस चले गए वे अब क्या कर सकते थे, उन्हें पता था राम तो अपने वचनों से बंधे हुए हैं, आज्ञाकारी राम अपने पिता की आज्ञा का पालन अवश्य करेंगे।

श्री राम, लक्ष्मण, सीता तीनों अब जंगलों में पैदल चलते हुए महर्षि भारद्वाज जी के आश्रम में पहुंच गए। वहां पर रात को विश्राम कर चित्रकूट पहाड़ की ओर चले गए। इस पहाड़ पर हरियाली ही हरियाली देख रामजी का मन खुश हो गया। तभी लक्ष्मण जी वहां रहने के लिए छोटी-सी कुटिया तैयार की वे जानते थे भैया को यह स्थान बहुत पसन्द आया है।

‘भैया, आपको यह स्थान बहुत पसन्द है न?

‘हां लक्ष्मण मैं चाहता हूं कि हमें कुछ समय यहीं पर व्यतीत करना चाहिए, इन पहाड़ों पर तो प्रकृति का सारा रुप बिखरा पड़ा है, कितना आनन्द आता है, यह बस देखकर-आहा क्या फल है, कितने फूल हैं, मुझे तो लग रहा है जैसे हम जंगल आकर बहुत बड़ी कैद से मुक्त हो गए हों । बस एक ही चिंता खा रही है- पिता जी का क्या हाल होगा?

दशरथ जी और श्रवण

राम को अयोध्या से गये छः दिन हो गए थे, उनके दुःख में राजा ने ऐसा बिस्तर पकड़ा कि उठ नहीं पाए, उन्हें रह-रह कर अपने बेटे का दुःख याद आ रहा था। अब उन्हें पता चल रहा था कि संतान का दुःख क्या होता है।

‘आज से कुछ वर्ष पहले ही तो उनसे यह भूल हुई थी जब वे शिकार खेलने गये थे तो उनका तीर एक अन्धे-लाचार बूढ़े के बेटे श्रवण के सीने में लगा था श्रवण-श्रवण ।’ बूढ़े माता-पिता की तड़पती आवाज अब भी उनके कानों में गूंज रही है।

पास बैठी कौशल्या ने राजा के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा-यह आप श्रवण-श्रवण क्या कह रहे हैं ?

कौशल्या यह मेरे अपने पापों का ही तो फल है, आज से कुछ वर्ष पहले की बात है । जब मैं रात को सरयु नदी के किनारे शिकार की तलाश में गया था, तो मैंने कलकल की आवाज सुनकर समझा कि यहां कोई मृगा पानी पी रहा है, बस यही समझकर मैंने वाण छोड़ दिया।

मेरा वाण मृग की बजाए नवयुवक, श्रवण कुमार के सीने में लगी । मैंने देखा वह धरती पर पड़ा तड़प रहा है। उसके सीने से खून बह रहा है।

‘हे भगवान यह तुमने क्या किया-मेरे अन्धे मां-बाप प्यासे तड़प रहे हैं, तुमने मुझे मार डाला, जाओ मेरे प्यासे मां-बाप को पानी पिला दो यह कहकर श्रवण कुमार मर गया। मैं उसके अन्धे मां-बाप के पास पानी लेकर गया, तो उन्होंने मेरी आवाज से ही पहचान लिया था कि उनका बेटा नहीं हूं।

उन्होंने चिंतित होकर अपने बेटे के बारे में पूछा, तो मैंने उन्हें झट से सारी कहानी सुना डाली।

अपने बेटे की मृत्यु के गम में तड़पते हुए उन्होंने मुझे यह शाप दिया कि जाओ, एक दिन तुम भी अपने बेटे के वियोग में तड़प-तड़प कर मरोगे, जैसे आज हम मर रहे हैं, बस इतना शाप देकर श्रवण कुमार के मां-बाप की मृत्यु हो गई।

आज मैं भी उन्हीं के शाप के कारण, अपने बेटे के दुःख में मर रहा हूं। कौशल्या मुझे लगता है मेरे प्राण कोई खींच रहा है, अब मैं इस संसार से जा रहा हूं। हे राम मैंने तुम्हें भी दुःख दिया और स्वयं भी सुख न पा सका… केवल एक औरत की ईर्ष्या की आग हमारे सारे परिवार की शत्रु बन गई-यह कहकर राजा दशरथ ने अपने प्राण त्याग दिए।

राजा दशरथ की मृत्यु के पश्चात् अयोध्या सूनी हो गई राजगद्दी खाली पड़ी थी। क्योंकि भाई तो ननिहाल में थे इस समय राजतिलक भी किया जाता तो कैसे ?

उसी समय मन्त्रियों ने भरत और शत्रुघ्न को ननिहाल से बुलवाने के लिए दूतों को भेजा।

जैसे ही भरत वापस अयोध्या अपनी मां कैकेयी के पास आए तो उन्होंने उसे पिता के मृत्यु का दुखद समाचार सुनाया भरत अपने पिता के मृत्यु की खबर सुनते ही फूट-फूटकर रोने लगे।

रोते-रोते उन्होंने भाई राम और लक्ष्मण के बारे में पूछा तो कैकेयी हंसकर बोली-बेटे उन्हें तो मैंने राजा से अपने वचनों के बदले में चौदह वर्ष के लिए वनवास भिजवा दिया और अयोध्या का राजतिलक तुम्हारे लिए मांगकर तुम्हें राजा बनवा दिया, क्यों भरत मैंने तुम्हारी सच्ची माँ होने का कर्तव्य निभा दिया न?

माँ यह तुमने बहुत अत्याचार किया है। एक ऐसा पाप किया है जिसका प्रायश्चित जीवन भर मैं नहीं कर पाऊंगा।

तुम मां नहीं कोई डायन हो, चुडैल हो जिसने अपने ही बेटे की सारी इच्छाओं का खून कर दिया। क्या तुम समझती हो कि मैं राम के स्थान पर अयोध्या का राजा बन जाऊंगा? नहीं नहीं मां नहीं ऐसा नहीं होगा।

मुझे सामने खड़ी माँ कौशल्या और सुमित्रा के पांव में गिरकर वह माफी मांगने लगा-मुझे क्षमा कर दो मैं वह अभागा बेटा हूं जिसे मेरी मां जीवित रहते हुए मुझे मार डाला।

मुझे अपने भाई राम की आवश्यकता है, मुझे भाई लक्ष्मण की जरुरत है मां जैसी भाभी सीता चाहिए माँ मुझे क्षमा कर दो मैं अपने भाईयों और भाभी को वापस लाने के लिए चित्रकूट जा रहा हूं।

बेटे भरत अब जो कुछ होना था हो चुका । अब रोने से कुछ होने वाला नहीं है । तुम यदि राम को लेने जाओगे वह आएगा नहीं पिता के वचन का पालन उसे अपने जीवन से भी प्रिय है।

मां मुझे भी अपने कर्त्तव्य का पालन करने दो, यह कह कर भरत वहां से अपनी सेना के साथ राम को वापस लाने के लिए चल पड़ा, भरत के साथ ही माता कौशल्या और सुमित्रा सारे देश की प्रजा भी अपने राम से मिलने के लिए चल पड़ी।

भरत की सेना, अयोध्या की प्रजा का पूरा काफला चित्रकूट की ओर चले आ रहे थे तो, दूर से लक्ष्मण जी ने देखा तो उन्होंने सेना के झंडे देखकर यह अन्दाजा लगा लिया कि यह अयोध्या की सेना है।

इसका अर्थ है कि भरत हमें मारने के लिए सेना लिए हुए आ रहा है । लक्ष्मण ने राम से कहा भैया! भरत बड़ी सेना लेकर हमारी ओर ही आ रहा है, मुझे तो उसकी नीयत खराब लगती है, शायद मां कैकेयी की भांति वह भी हमारा नामोनिशान मिटाना चाहता है। .

लक्ष्मण क्रोध से कोई लाभ नहीं, धैर्य से काम लो, मैं जानता हूं, भरत ऐसा नहीं है। भैया यदि वह ऐसा नहीं है तो इतनी बड़ी सेना किस लिए लेकर आ रहा है ?

यह तो उसके आने पर ही पता चलेगा।

भैया, आपके इसी भोलेपन के कारण तो हम से जंगलों में आ गए अब यह लोग हमें यहां पर भी मारने के लिए आ गए हैं । मैं कहता हूं आप युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।

नहीं-लक्ष्मण नहीं भरत को मारकर यदि मुझे दोनों लोकों का राज्य भी मिल जाये तो भी मैं उसे नहीं मारुंगा, बस तुम भरत के आने की प्रतीक्षा करो।

थोड़ी देर पश्चात भरत अपने रथ से उतरकर सीधा राम के पास गया, हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम कर रोते हुए उनके चरणों में गिर पड़ा, और ऊंची आवाज में रोकर कहने लगा।

भईया राम मुझे क्षमा कर दो मैं आपको लेने के लिए आया हं, आप मेरे साथ चलकर अपना राज्य सम्भालो क्योंकि आपकी जुदाई के गम में पिताजी की भी मृत्यु हो गई है।

हे भगवान्! मैं यह क्या सुन रहा हूं पिताजी । यह आपने क्या किया ? आपकी खुशी के लिए तो मैंने यह वनवास स्वीकार किया था और आप ही मुझे छोड़कर चल गए।

राम लक्ष्मण सीता तीनों ऊंची-ऊंची आवाज में रोने लगे थे। माँ कौशल्या, सुमित्रा अपने बेटों को बहुत सहारा दे रही थी, उन्होंने भी राम से कहा कि वह वापस अयोध्या लौट चले।

किन्तु राम के पास तो एक ही उत्तर था कि मैं केवल अपने पिता का दिया हुआ वचन निभा रहा हूं। अब मैं चौदह वर्ष से पहले-वापस घर नहीं जाऊंगा । बस मुझे इतना आशीर्वाद दो कि मैं इस तपस्या में पूरा उतरूं।

भैया भरत तुम्हारा इसमें कोई दोष नहीं और न मैं माता कैकेयी को दोषी मानता हूं। यह तो बस भाग्य के खेल हैं। अब तुम चलो और अयोध्या पर राज्य करो।

भैया उस राजगद्दी पर केवल आपका ही अधिकार है। यदि आप वापस नहीं चलते तो अपने पांव की खड़ाऊं मुझे दे दीजिए। आपके स्थान पर मैं इनको ही तख्त पर रखकर राज-काज को देखूगा।

ठीक है भरत ! मैं तुम्हारी यह इच्छा अवश्य पूरा करूंगा।

ये कहकर राम ने अपनी खड़ाऊं उतारकर भरत को दे दी। भरत ने उसे खडाऊं को उठाकर अपने माथे से लगाया । भरत अब तुम इस खड़ाऊ की लाज रखना । अपने देश की रक्षा करना और प्रजा के दुखों को दूर करना । किसी के साथ अन्याय न हो यही मेरी इच्छा है ।

भैया मैं आपके आदर्शों को भली-भांति जानता हूं। मुझे पता है आपने केवल अपने आदर्शों के लिए ही तो इतना बड़ा त्याग किया है। आप महान तपस्वी हैं, आप तो मेरे लिए प्रेरणा के सूत्रधार हैं । भैया मैं आपकी प्रतिज्ञा में एक-एक पल गिनकर काटूंगा।

मैं आऊंगा भरत तुम मेरी चिन्ता मत करना ।


अयोध्याकांडAyodhya Kand in Hindi का यह दूसरा भाग कैस लगा कमेंट करके जरूर बताये, अगर आपको इसमें कुछ कमियां दिखती है तो वो भी आप जरूर बताए। उसे हम जल्द से जल्द सही कर देंगे।

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