Best Explained सम्पूर्ण रामायण कथा | Ramayan in Hindi

Ramayan in Hindi की यह कथा हमने कुल आठ अलग अलग आर्टिकल में लिखा है, इससे आप सभी पाठकों को पढ़ने में आसानी हो। Ramayan in Hindi कथा का यह पहला भाग है जिसमे रामायण की शुरुआत के बारे में लिखा है –

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सम्पूर्ण रामायण कथा | Ramayan in Hindi

मानिषाद ! प्रतिष्ठा स्वमगमः शास्वतो सभा ।
आकोण्यचमिथुनादे कमवधोः काम मोहितम् ॥

(बाल्मीकि)
महर्षि बाल्मीकिजी के मुख से निकला यह पहला श्लोक है,
और
यह श्लोक से हमारे महाकाव्य पवित्र धार्मिक ग्रन्थ रामायण की नीव रखी, एक प्रकार से यही श्लोक, जब बाल्मीकि जी, एक बार नदी के किनारे बैठे प्रकृति के विचित्र दृश्य देखकर कल्पना के सागर में डूबे हुए थे। उसी समय उन्होंने लम्बी चोंच वाले चुटकिले पक्षियों की एक टोली को अपने ही संसार में मग्न देखा।

इनके पास ही एक कौवों पक्षियों का जोड़ा बैठा आपस में किलोल कर रहा था । यह दोनों पति-पत्नी लगते थे, क्या आनन्द आ रहा था। उन्हें कौवी का पति चोंच से चोंच लड़ा रहा था कि उसी समय किसी शिकारी ने अपना तीर उसके शरीर में मार दिया।

बस यह तीर लगते ही वह बेचारा अपनी पत्नी से जुदा होकर, धरती पर गिर पड़ा और तड़पने लगा अपने पति को इस प्रकार तड़पते देख कौवी बेचारी रोने लगी। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे, दूर बैठे कविवर यह दर्द भरा दृश्य अपनी आंखों के सामने न देख सके, उनके मन , की पीड़ा,
‘भानिषाद’ श्लोक के रुप में बाहर निकली –

वही था कवि जो दूसरों के दुःख को देखकर तड़प उठा। जब वह गम कवि जी से सहन न हुआ तो उन्होंने अपने शिष्य भारद्वाज से कहा

भारद्वाज! मेरे शोक पीड़ित हृदय से वीणा की लय से गाने योग्य चार पदों और समान अक्षरों का वह वचन निकला है

मुझे आशा है मेरा यह वचन आने वाला समय में अत्यन्त लोकप्रिय होगा । जैसे ही बाल्मीकि जी ने यह श्लोक भारद्वाज को सुनाया, तो उन्होंने एक ही बार में उसे ‘याद कर लिया। दोनों गुरु चेला सुबह-शाम ये गाते रहते थे इसमें कितना दर्द था. पीडा थी उस बेचारे पंक्षी की मृत्यु का मात्र कारण उस शिकारी का लालच था । कितने दिन तक बाल्मीकि जी उदास अपनी कुटिया में पड़े रहे, दुःखी मन उन पर बोझ बन गया ।

वे दोनों इस धुन में मग्न चले जा रहे थे कि उनका ध्यान अपने श्लोक के अर्थ पर गया । फिर सोचने लगे कि मैंने निषाद को व्यर्थ में इतना कठोर श्राप दिया फिर उन्हें नारद जी की बहुत याद आ गई।

इस बार उन्होंने नारद जी से पूछा था

हे देवर्षि, मुझे किसी ऐसे पुरुष का नाम बतलाइये जो सारे गुण अपने में रखता हो, सुन्दर हो, वीर हो और धर्मोत्शाही हो सत्यवादी हो वह अपनी प्रकार का अकेला ही गुण पुरुष हो ।

महर्षि, वैसे ही अपनी कल्पना का यह पुरुष इस संसार में नहीं मिल सकता । किन्तु फिर भी आपकी यह आशा पूरी होकर रहेगी, क्योंकि इस पृथ्वी पर उस गुणी पुरुष ने राजा दशरथ के घर राम के रूप में जन्म ले लिया है । उसमें वे सारे गुण हैं जो आप चाहते हैं :

नारद जी ने तो संक्षिप्त में राम की पूरी कथा सुना दी थी।

यही कथा मानिषाद श्लोक का दूसरा अर्थ बनकर उनकी आंखों के सामने नाचने लगी, जो इसका दूसरा अर्थ यही था-हे माधव रामचन्द्र तू अनेक वर्ष तक राज्य करेगा।

महाकवि बाल्मीकि जी तो जातिवाद का पाठ करते-करते दीवाने हो गए थे। एक देवी सरस्वती को उनकी हालत पर दया आई तो उन्होंने अपने पिता ब्रह्माजी से कहा-आप ही उस महाकवि को कुछ कीजिए नहीं तो वह पागल हो जाएगा।

उस समय स्वयं ब्रह्माजी ने महर्षि को दर्शन दिए और बोले-हे महर्षि आप क्यों दीवाने हो रहे हैं। इस प्रकार तो आप इस संसार से दूर चले जायेंगे, यह जीवन आप पर बोझ बन जायेगा । मानिषाय का अर्थ और भी तो हो सकता है।

आप यह क्या कह रहे हैं भगवान ?

हां महर्षि आप इस बुद्धि को भगवान रामचन्द्रजी के चरित्र का वर्णन करने में लगाएं तो इससे आपकी आत्मा को शान्ति मिलेगी और आप उस कौवे की मृत्यु का दुःख भी भूल जायेंगे।

आपकी आज्ञा पालन करना तो मेरा कर्त्तव्य है भगवान! ब्रह्माजी के आगे अपना सिर झुकाकर उन्होंने दोनों हाथ जोड़ दिए ।

ब्रह्माजी के आशीर्वाद लेकर बाल्मीकि जी ने अपने शिष्य, भारद्वाज की सहायता से इस महाग्रन्थ रामायण की रचना की जो उन्होंने चौबीस हजार श्लोकों में पूर्ण की थी।

इस प्रकार से आदि कवि बाल्मीकि जी उस कौवे की मृत्यु का गम भूलकर रामायण की पूर्ति में लगे रहे कल्पना कीजिए कि इस चौबीस हजार श्लोकों को पूर्ण करने में कितना समय लगा होगा।

मानिषद से आरम्भ होकर हमारी यह रामायण राम-लक्ष्मण और सीताजी के चरित्र में खो जाती है।

उससे जन्म लेता है।
महापण्डित रावण ।

जो संसार भर का महावली होते हुए एक ऐसी भूल करता है जिसने उसके सारे ज्ञान का सर्वनाश कर दिया । जो महापण्डित होते हुए भी आज घृणा का पात्र बना है।

उसी रामायण की कथा बाल्मीकि जी ने यूं सनाई।

श्री रामायणजी की आरती

आरती श्री रामायण जी की।
कीरति कलित ललित सिय पी की ॥
गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद ।
बाल्मीकि बिग्यान · विसारद ॥
सुक्र सनकादि सेष अरु शारद ।
बरनि पवनसुत कीरति नीकी |
गावत वेद पुरान अष्ट दस ।
छओ शास्त्र सब ग्रंथन को रस ॥
मुनि जन धन संतन का सरबस ।
सार अंस समत सबही की ॥2॥
गावत संतक्ष शम्भु भवानी।
अरु घट संभव मुनि बिग्यानी ॥
व्यास आदि कबिवर बखानी।
कागभुसुंडि गरुड़ के ही की ॥3॥
कलि मल हरनि विषय रस फीकी।
सुभन सिंगार मुक्ति जुबती की ॥
बलन रोग भष भूरि अमो की ।
तात मात सब विधि तुलसी की ।।4।।


Ramayan में 7 अलग-अलग तरह के कांड हैं जो कि इस प्रकार है

  1. बालकांड – Balakanda
  2. अयोध्याकांड – Ayodhya Kanda
  3. अरण्यकांड – Aranya Kanda
  4. किष्किन्धा कांड – Kishkinda Kanda
  5. सुंदर कांड – Sundara Kanda
  6. लंका कांड – Lanka Kand
  7. लवकुश कांड – Luv Kush Kanda

Ramayan in Hindi का यह पहला भाग कैस लगा कमेंट करके जरूर बताये, अगर आपको इसमें कुछ कमियां दिखती है तो वो भी आप जरूर बताए। उसे हम जल्द से जल्द सही कर देंगे।

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